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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८९

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मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा ४५७ हैं । तुम, जमनालालजी और मैं तो यही समझेंगे कि यह अच्छा काम है । परन्तु मैंने सलाह दी है कि यह देखते हुए कि पैसा अभी इस्तेमाल नहीं हुआ है, दान देने- वालेकी अनुमतिके बिना यह पैसा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह निश्चित है कि दान देनेवाला इसकी अनुमति नहीं देगा; क्योंकि तथाकथित अछूतोंके बारेमें लोग ठीक तरहसे नहीं जानते । यदि जमनालालजी उस पैसेको ऐसे उद्देश्यके लिए इस्तेमाल करते हैं, जिसका कि दान देनेवालेके मनमें कभी खयाल ही नहीं था, तो वह गलती होगी और वे अस्तेयकी प्रतिज्ञाभंगके दोषी होंगे । दूसरे प्रश्नके सम्बन्धमें : मैं तुम्हारा ही मसला लेता हूँ । तुम अपनी नौकरीको तिलांजलि देकर अपने आपको अपेक्षत: निर्धनताकी स्थितिमें ले आये हो । निस्सन्देह इस कारण तुम अधिक समृद्धिशाली हो और यदि तुम्हारी निजी जरूरतें आगे और कम हो जायें तो तुम फिर और भी अधिक समृद्ध हो जाओगे । यह ज्यादा अच्छा है कि आदमी अपना सर्वस्व दे दे, इसकी अपेक्षा कि वह एक भाग अपने लिए और एक भाग समाजके लिए रखे ही । जब आदमीकी आवश्यकताएँ शून्य हो जाती हैं, वह अपना सर्वस्व दे देता है । आशा है कि अब बात साफ हो गई है। मैं ठीक हूँ । अंग्रेजी (एस० एन० १३४२९ ) की माइक्रोफिल्मसे । ५०८. मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा महादेव देसाईने इन पृष्ठोंमें पठानोंके व्यवहारके सम्बन्धमें जो आरोप लगाए हैं, सूचना निदेशकने उनका जिस तरह खण्डन किया है वह ध्यान देने योग्य है । महादेव देसाईको कुएँसे पानी निकालनेके वक्त गिर जानेसे गहरी चोट आ गई है, इसलिए वे बिस्तर पर पड़े हैं और इस कारण वे साप्ताहिक टिप्पणियाँ लिखने और इस खण्डनकी आलोचना करनेमें असमर्थ हैं । किन्तु निदेशकने जो खण्डन किया है, उसके विवेचनके लिए किसी विशेषज्ञकी जरूरत नहीं है। इस खण्डनमें उन्होंने जो बातें स्वीकार की हैं वे उनके पक्षके लिए अर्थात् सरकारके लिए अति प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करनेवाली हैं । उनका खण्डन बिलकुल निरर्थक है; जहाँ उसमें थोड़ा-बहुत अर्थ है भी वहाँ वह असमाधानकारक है । किन्तु निदेशककी विज्ञप्तियोंकी जाँच करनेसे पहले मैं इस बातको स्पष्ट कर दूं । निदेशककी मार्फत इन विज्ञप्तियोंकी सूचना प्रकाशित करनेमें सरकारका हेतु क्या है ? क्या वह अपने अधिकारियोंके विरुद्ध अभियोगोंमें अदालतोंकी जगह लेना और स्वयं निर्णायक बनना चाहती है ? मैं बिना किसी झिझकके स्वीकार करता हूँ कि जहाँ तक जनताका सम्बन्ध है; सत्याग्रह प्रचार कार्यालयके आरोप एक पक्षीय असिद्ध वक्तव्य हैं । किन्तु इस प्रचार कार्यालयके सम्मुख तो दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है । १. ये यंग इंडियाके मई और जूनके अंकोंमें प्रकाशित हुए थे । Gandhi Heritage Portal