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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९१

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मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा ४५९ जरूरत नहीं रही है तो एक विशेष अधिकारीके साथ और विशेष मजिस्ट्रेटोंकी अधीनतामें कार्रवाई करनेके लिए अच्छे बहादुर पठानोंकी इस सशस्त्र पुलिसकी क्यों जरूरत है ? यदि लोगोंको पठानोंके हटाए जानेके पीछे किसी ऐसी कुटिल योजनाका सन्देह हो, जिसका उद्देश्य सत्याग्रहियोंको और भी अधिक फँसाना और आतंकित करके वशमें करना हो, तो ऐसी आशंका क्षन्तव्य होगी । एक और विज्ञप्तिमें एक दिन एक पठानके चोरी करते रंगे हाथों पकड़े जानेकी घटनाका खण्डन किया गया है। यह खण्डन एक न्यायाधीश जैसी भाषा और निश्चित परिणाम निकालते हुए इस तरह दिया गया है मानो निदेशकके सामने वादी और प्रतिवादी दोनों मौजद थे। जिस पठान चौकीदारने उस मनुष्यको रंगे हाथों छुरा और चोरीका नमक लिए हुए बारडोली स्टेशन पर पकड़ा था, उसने श्रीयुत वल्लभभाई पटेलके सम्मुख रेलवे यूनियन के अध्यक्षके रूपमें एक बयान पेश किया था। यह बयान इस समय मेरे सामने मौजूद है। उसने इसमें कहा है कि “पुलिस अधिकारी गवाहीको कमजोर बनानेकी कोशिश कर रहे हैं और मुझे शिकायत वापस ले लेनेके लिए डरा-धमका रहे हैं।” किन्तु निदेशकने यह निर्दोष परिणाम निकाला है; "पुलिसने इस मामलेको झूठे मामलोंके वर्ग में रखने लायक समझा है।" इसमें आश्चर्यकी बात कुछ नहीं है; क्योंकि रेलवेका पठान कर्मचारी पुलिसके हाथोंकी कठपुतली बननेके लिए तैयार नहीं है । यह बयान भी कि "डिप्टी सुपरिंटेंडेंट पुलिस निश्चित रूपसे कह सकते हैं कि असहयोगियोंने जो चित्र लिए हैं वे कथित चोरी करनेके वक्तके नहीं हैं" उसी दर्जेका है। किन्तु इस बातको स्वीकार करना कि अभियुक्त पठान रेलवे प्लेटफार्म पर था और उसने एक मुट्ठी, बल्कि दो मुट्ठी नमक चुराया था, सरकारी पक्षको काफी धक्का पहुँचाता था। कौन नहीं जानता कि जब अपराध करते हुए पकड़े गए लोगोंको बचाना होता है तब भ्रष्ट पुलिस आँखों देखे तथ्योंको भी हल्का बनाकर पेश करती है ? इस मामलेमें नमक खराब हो गया था और वह जमीन परसे उठाया गया था। चूंकि पठानके पास छुरा पाया जाना एक प्रतिकूल बात है, इसलिए उसके पास छुरा होनेकी बातका खण्डन कर दिया गया है। सौभाग्यसे मैं दक्षिण आफ्रिकामें पठानोंसे परिचित था और मैं यहाँ भी कितनों ही को जानता हूँ । जबतक उन्हें बिगाड़ा नहीं जाता, उनकी वीरता असन्दिग्ध होती है । किन्तु मुझे याद नहीं आता कि मैंने किसी पठानको बिना छुरेके देखा हो । फिर भी कथित असहयोगी यह दावा नहीं करते कि उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, उनकी सत्यतामें उनका पूरा विश्वास है। उनकी माँग यह है कि इस विषयमें निष्पक्ष जाँच की जाये। सूचना निदेशक ऐसा नहीं कहते । वे अपनी ही कही बातोंको फैसलेकी तरह प्रामाणिक मानते हैं । निदेशककी दूसरी बातका खण्डन भी पहली बातके खण्डनकी तरह ही परेशानी में डालनेवाला है । पठानने कल्याणजीको धमकी दी, इस बात से इनकार नहीं किया गया है; बल्कि इस बात से इनकार किया गया है कि उसने उनको छुरा भोंकनेकी धमकी दी। कहा जाता है कि पठानको चित्र खिंचवाने में आपत्ति थी, इसलिए उसने धमकी Gandhi Heritage Portal