४६० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय दी थी। निदेशक अकारण ही यह मान लेते हैं कि पठान चित्र खिंचवानेमें आपत्ति करते हैं। इस बातको असहयोगी भली-भाँति जानते हैं। मैं असहयोगी हूँ; किन्तु मुझे अभी तक किसी पठान द्वारा ऐसी आपत्ति किये जानेकी कोई जानकारी नहीं है । मैं जानता हूँ कि बहुतसे पठानोंने चित्र खिंचवाए हैं और मैं ऐसे कुछ पठानोंको भी जानता हूँ जो चित्र खिचवानेके लिए उत्सुक रहते हैं। मुझे श्री वल्लभभाईसे पता चला है कि यह बात मालूम होनेसे पहले कि कैमरा उनको बदनाम करनेके लिए प्रयुक्त किया जा रहा है, पठान चित्र खिचवानेके लिए लालायित रहते थे । उन्होंने मुझे यह विश्वास भी दिया है कि यदि मौका मिलेगा तो वे यह बताना चाहते हैं और यह सिद्ध भी कर सकेंगे कि यह आपत्ति कैसे और कहाँ गढ़ी थी । और हम सभी जानते हैं कि पठानोंके शाहू महाविभव अमानुल्ला फोटोग्राफरोंसे होनेवाली परेशानियोंको स्वेच्छासे सहते हैं । किन्तु निदेशकने अपने बचाव के लिए जो शब्दजाल रचा है, उसमें एक बात स्पष्ट उभर कर आती है, और वह यह है कि कल्याणजीको धमकी दी गई थी। मैं इस प्रसंगमें यह भी स्पष्ट कर दूं कि बारडोलीके सत्याग्रही इस समय असहयोग नहीं कर रहे हैं। प्रत्युत सरकारसे लगानकी दर निश्चित करनेके बारेमें वास्तविक स्थिति पता लगाने में सहयोग करना चाहते हैं । वे असहयोगीकी हैसियतसे तो समितिकी मांग नहीं कर सकते थे। उस हैसियत से तो वे केवल सरकारकी सत्ताको ही अस्वीकार कर सकते हैं। किन्तु उन्होंने यह नहीं किया है। उनका सत्याग्रह वर्तमान सरकारसे न्याय प्राप्त करने तक ही सीमित है । तीसरा खण्डन एक पठान द्वारा एक स्त्रीको उसके घरमेंसे घसीट ले जानेके सम्बन्धमें है । पठान खुले हुए दरवाजेके भीतर खड़ा था, यह बात स्वीकार की गई है । यह नहीं बताया गया है कि वह किसीके घर के दरवाजेके भीतर क्यों खड़ा था । यह बात भी स्वीकार कर ली गई है कि एक स्त्रीने हिम्मत के साथ आगे बढ़ कर यह कहा कि एक पठान घरमें घुसने की कोशिश कर रहा था और उसने मुझे खींचा और धक्का दिया। इसके बाद लोगोंको यह बहुमूल्य जानकारी दी गई है कि इस स्त्रीने कुछ दिन बाद श्री बेंजामिनसे माफी माँग ली थी। श्री बेंजामिनने जब उसपर झूठ बोलनेका आरोप लगाया था तो उसने कहा, "मैं क्या करती । निश्चय ही श्री बेंजामिन के कथनको कोई महत्व देनेके पहले उस स्त्रीसे जिरह की जानी चाहिए। चौथा खण्डन एक पठानके अभद्र व्यवहारके सम्बन्ध में है । यहाँ भी पठानके नंगे होनेकी बातका खण्डन नहीं किया गया है। किन्तु केवल यही कहा गया है कि इस अभद्र दर्शनके पीछे हेतु अभद्र नहीं था। और हेतु अभद्र न होनेका निष्कर्ष निकालनेकी कोशिश इस आधार पर की गई है कि ग्रामीण गाँवमें चाहे जहाँ पाखानेके लिए बैठ जाते हैं । समझदार लोग स्वयं इस प्रकारके खण्डनका निष्कर्ष आसानीसे निकाल सकते हैं । उसी प्रकारका खण्डन दो लड़कियोंके सामने एक पठानके नंगे खड़े हो जानेकी बातका किया गया है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९२
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