मुलजिम न्याशाधीश बन बैठा ४६१ छठा खण्डन एक स्त्री पर किए गए अशिष्ट आक्रमणका है। यह आक्रमण झिझकते झिझकते स्वीकार किया गया है। किन्तु निदेशक इस सम्बन्धमें भोलेपनसे कहते हैं, सम्भव है जैसा रहमत कहती है, वैसा किसीने किया हो; किन्तु इस बातका कोई प्रमाण नहीं है कि वह मनुष्य (यदि कोई था तो) पठान था, मानो रहमतकी यह गवाही निरर्थक है कि आक्रमण करनेवाला मनुष्य पठान था । सत्याग्रह कार्यालयमें रमतको बचानेवाले गाड़ीवानका यह बयान भी मौजूद है कि आक्रमण करनेवाला सरकार द्वारा नियुक्त पठान था । मैंने विज्ञप्तियोंमें से ये कुछ ही नमूने लिए हैं और 'यंग इंडिया' से विशेष रूपसे सम्बन्धित उदाहरणका विशेष विश्लेषण किया है, क्योंकि मैं यह दावा करता हूँ कि यह पत्र पूर्णतः निष्पक्ष रहता है और मनुष्यसे चूक तो हो ही सकती है । फिर भी जहाँतक सम्भव है, वहाँतक सत्य बातें छापनेका ही आग्रह रखता है । 'यंग इंडिया' में जो लोग लिखते हैं उन्हें लेखोंपर अपने नामका संक्षिप्त हस्ताक्षर देना ही होता है । श्रीयुत महादेव देसाई स्वयं वकील हैं। वे दस सालसे ज्यादा अर्से से पत्रकारिताके धन्धेसे सम्बद्ध हैं, अतः उन्हें एक पर्याप्त प्रशिक्षित पत्रकार माना जा सकता है। इस कारण अन्य कई योग्यताओंके साथ-साथ उनमें झूठ और सचको अलग- अलग छाँट सकनेकी योग्यता भी अवश्य है । वे तथ्योंको अपनी आँखोंसे देखने और अपने कानोंसे सुननेके लिए थोड़े-थोड़े दिन बाद बारडोली स्वयं जाते हैं । यह कहा जा सकता है कि उनकी एक प्रतिष्ठा है, और ऐसे में उसपर आंच आ सकती है । इसलिए वे जब चारपाईमें पड़े हैं, मैं उनकी उन टिप्पणियोंको, जिनका खण्डन किया गया है और निदेशकके खण्डनोंको पढ़नेके लिए बाध्य था । मुझे उनमें कोई ऐसी बात नहीं मिली, जिससे महादेवने बारडोलीमें स्वयं देखकर जिन तथ्योंका निर्धारण किया था उनपर कोई आँच आती हो। और मैंने यह भी देख लिया कि निदेशकका खण्डन उनकी बातको झूठ सिद्ध नहीं कर पाता । पठानोंने भैंसोंको जिस निर्दयतासे पीटा है और जिसके फलस्वरूप बेचारी एक भैंस तो मर भी गई, उसके सम्बन्ध में निदेशक मौन ही रह गए हैं, क्योंकि उसके लिए यही सुविधाजनक था। क्या उनको मालूम है कि उनके इस कथनके बावजूद तलाटियों और पटेलोंने इस्तीफे दबावमें आकर दिये हैं, स्वयं तलाटियों और पटेलोंने उनके इस बदनामी-भरे आरोपको दृढ़तापूर्वक गलत बताया है । इन विज्ञप्तियोंमें और गवर्नरके पत्रोंमें भी इस एक बात पर बहुत जोर दिया गया है कि बारडोलीके बनिये भी पठानोंको चौकीदार रखते हैं; इसलिए सरकार पर पठानोंको लानेका दोष नहीं लगाया जा सकता । शायद गवर्नर और निदेशक महोदय नहीं जानते कि पठानोंको चौकीदारों आदिके रूपमें नौकर रखनेकी बात गुजरात में भी कोई पसन्द नहीं करता । ऐसा नहीं कि गुजरातके लोगोंको पठानोंसे कोई द्वेष हो, किन्तु पठानोंको नौकर रखनेके पीछे एक दूषित हेतु है और जो लोग उनकी सेवाएँ लेते हैं वे पठानोंमें से भले लोगोंको रखनेकी बात नहीं सोचते; बल्कि ऐसे ही पठानोंको ठोक बजाकर नौकर रखते हैं जो ज्यादासे ज्यादा धूर्तता कर सकते Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९३
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