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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९४

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४६२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हों । और यदि स्वार्थी बनिए और अन्य लोग अपना रवैया न सुधारेंगे तो उन्हें और गुजरातके शेष लोगोंको भी स्वार्थकी दृष्टिसे बदमाशोंको हाथमें करके उनका उपयोग करनेकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; फिर वे बदमाश चाहे पठान हों, चाहे दूसरे कोई और, किन्तु जिस प्रथाके तत्वतः बुरे होनेका सरकारको ज्ञान है और जो सामान्य जनोंको कुरुचिपूर्ण लगती है, यदि सरकार किसी ऐसी प्रथाका अनुकरण करे तो यह तो एक गलतीके बाद दूसरी गलती करना कहलाएगा; और यदि तब उसपर अतिरिक्त दोष लगाया जाये तो उसे आश्चर्य नहीं मानना चाहिए । सामान्य लोगोंका पठानोंको नौकर रखनेसे जो आशय होता है वही आशय बारडोलीमें सरकार द्वारा पठानोंको भेजनेका भी हो सकता है। और गवर्नर या निदेशक इस कथनका कि कुछ पठान विदेशी नहीं हैं, लोगोंसे क्या निष्कर्ष निकालनेकी अपेक्षा रखते हैं । निश्चय ही दोनोंमें इतना जानने योग्य समझ तो होनी ही चाहिए कि बारडोलीमें पठानोंके विरुद्ध जो आपत्ति उठाई गई है वह उनके पठान होनेके कारण नहीं उठाई गई है । यहाँ 'पठान' शब्दका अर्थ अलग है । बारडोलीके लोगोंने इसका प्रयोग मुख्यतः 'बद- माश या गुण्डे ' के अर्थमें किया है। बारडोलीके लोग अच्छे पठानोंका स्वागत करेंगे, फिर चाहे वे कहींसे क्यों न आयें। और फिर जिसने उनका पक्ष लिया और एक पठानके सम्बन्धमें वल्लभभाईको वक्तव्य दिया वह भी तो आखिर रेलवे द्वारा नियुक्त एक पठान ही था । इस तरह जो आपत्ति है वह किसी जाति-विशेषके सम्बन्धमें न होकर, उन जैसे लोगोंको लेकर है जो बारडोलीमें रखे जाते हैं । इसलिए सरकार द्वारा पठानोंको हटाए जानेसे और उसकी जगह सशस्त्र पुलिस भेजनेसे स्थिति तनिक भी नहीं बदलती । सरकारके बारेमें यह न कहा जाये कि यदि बारडोलीके लोग अभी तक पठान रूपी चाबुकोंकी शिकायत करते थे, तो अब उनकी जगह सरकारने उनको विशेष मजिस्ट्रेटों द्वारा समर्थित सशस्त्र पुलिस रूपी बिच्छू बख्श दिए हैं। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २१-६-१९२८ ५०९. बारडोलीका घपला सरकार बारडोलीके मामलेमें जितना ही अपना बचाव करना चाहती है, वह अपना अपराध उतना ही बढ़ाती जाती है। श्रीयुत मुन्शीको लिखे गये गवर्नरके लम्बे पत्र तो इस गुत्थीको और भी उलझा देते हैं और श्रीयुत मुन्शी जैसे संविधानज्ञकी दृष्टिमें भी उनकी स्थिति सुधरती नहीं है । गवर्नरके पत्र तो मामलेको साफ टाल जाते हैं। गवर्नर साहब कहते हैं एक और जाँच की जा चुकी है और अपने पत्र लेखकको आश्वासन देते हैं कि सरकारकी कार्यकारी परिषद्का एक भी सदस्य ऐसा नहीं है, जो सरकारी कार्रवाईके औचित्यके बारेमें, बल्कि जिसे दरअसल उसकी उदारता कहना चाहिए, पूरी तरह सन्तुष्ट न हो । Gandhi Heritage Portal