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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९५

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बारडोलीका घपला ४६३ यह तो सरकार अपनी पुरानी दलील दुहरा रही है, जिससे कोई परिणाम नहीं निकलता। अगर सरकार, पत्र-व्यवहारमें जिनका जिक्र किया गया है वैसी पचासों जाँच कर ले, तो भी उससे स्थिति नहीं सुधरेगी। बल्कि उल्टे इन जाँचोंसे यही बात सिद्ध होगी कि सरकार इस बात पर तुली हुई है कि जब-जब बारडोलीवाले रोटी माँगें, सरकार उन्हें पत्थर मारे। वे कोई ऐसी गुप्त जाँच नहीं चाहते, जिसमें उनके अपने आदमी न हों और उनका स्थान वहाँ ऐसा न हो कि वे उसमें उपयोगी और प्रभावकारी कार्य कर सकें। वे तो खुली और स्वतन्त्र जांच चाहते हैं । उनका दावा है कि सरकार जिसे न्याय बल्कि उदारता कहती है, वह उन लोगोंकी समझ में अन्याय और जुल्म है। उनका दावा है, और इस पत्रमें भी यह प्रमाणित करनेका प्रयत्न किया गया है कि श्री जयकर और श्री एन्डर्सनकी रिपोर्टोकी कोई कीमत नहीं है और वे गलत बयानियों और हिसाब जोड़नेकी भूलोंसे भी भरी पड़ी हैं । " वे कहते हैं कि हम किसी भी खुली, निष्पक्ष और स्वतन्त्र जाँच समितिके आगे अपने इल्जाम साबित कर सकेंगे । सरकार गर्वसे और बार-बार वही बात कहकर कान पका रही है कि उसने न तो श्री जयकरकी ३० फीसदीकी और न श्री एन्डर्सनकी २९ फीसदीकी (सच- मुच बहुत बड़ी उदारता है ! ) बढ़ोतरी करनेकी ही सलाह मानी है, बल्कि उसने तो उसे घटाकर २० फीसदी रखा है । और अब गवर्नर साहब यह भी फरमाते हैं कि इतनी कमी न सिर्फ न्यायसंगत ही है, बल्कि उदारतापूर्ण भी है ! मगर जनता तो उदारताकी भीख नहीं माँगती। वह तो सीधा साफ इन्साफ मांगती है और दावा करती है कि २० फीसदीकी बढ़ती भी, वहाँकी हकीकतको देखते हुऐ, वहाँके किसानोंकी स्थितिको देखते हुए नहीं होनी चाहिए थी। दूसरी ओर गवर्नर साहब फिर भी यही कहते जा रहे हैं कि अगर कोई जाँच समिति बैठाई जाती तो लगानमें इससे अधिक बढ़ती होती। अगर सरकार सच्चे दिलसे यही विश्वास करती है तो फिर वह प्रजाकी जाँच समिति बैठानेकी अत्यन्त वाजिब प्रार्थनाको क्यों नहीं मान लेती ? प्रजा उसका फैसला माननेको तो तैयार ही है । जब लोग सरकारी अधिकारियोंकी रिपोर्टोंको ही गलत बताते हैं, तब तो यह घोर अन्याय और अपमान है कि सरकार उनके सामने उन दूसरे अधिकारियोंकी रिपोर्ट ला फेंकती है, जो अपने निर्णयोंका आधार उन दस्तावेजोंको बनाते हैं जिनमें अक्सर गलतियाँ छिपाई गई होती हैं और इससे भी ज्यादा बार जो केवल सतही होती हैं । गवर्नर साहब अगर सचमुच जैसा कि वे कहते हैं न्याय करना चाहते हैं तो वे बारडोली के जिन लोगोंके लिए अपने पत्रमें सहानुभूति और चिन्ताका इजहार करते हैं, उन लोगोंके कष्टोंसे पावनीकृत उनकी इस सम्मानजनक माँगको स्वीकार कर लें । मगर गवर्नर साहब यह घोषित करते हैं कि उनकी सहानुभूतिकी धारा, 'बाहरी लोगों' के बीचमें आ पड़नेसे, जिन्हें गालियाँ दे देकर गुजरात के कमिश्नरने प्रसिद्ध कर दिया है, पूरी-पूरी नहीं बहने पाती ! अगर इन किसानोंके रास्तेमें, जिनके बारेमें १. देखिए: 'बारडोलीका मामला वधा है ?", १४-६-१९२८ । Gandhi Heritage Portal