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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९६

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४६४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय गवर्नर साहब कहते हैं, वे बखूबी "जानते हैं कि अगर उन्हें लगान भरने दिया जाये तो दूसरे किसानोंके समान वे भी अपना लगान भर देंगे " वे ही खड़े हुए हैं तो सरकार इन बाहरसे अनधिकार प्रवेश करनेवालोंको एक ही बार वहाँसे हटा क्यों नहीं देती ? अबतक तो सरकारके रास्तेमें जिसने भी सिर उठाया, उसे हटा देनेका उपाय सरकारको मिल जाता था ! तब फिर वह (गुजरातके कमिश्नरकी सुन्दर भाषा में) खेड़ाके इन आन्दोलनकारियोंके गिरोहको जो गरीब बारडोलीवालों पर ही जीते हैं " अछूता क्यों छोड़ती है और निर्दोष किसानोंको एक साथ ही इन आन्दोलनकारियों और पठानोंका या उनके बदले बुलाई गई पुलिसका शिकार क्यों होने देती है ? गवर्नर अपनी " संवैधानिक" स्थितिका औचित्य बताने और श्रीयुत वल्लभभाई और उनके वफादार साथियोंको बदनाम करनेकी जल्दी में अपना यह बयान भी भूल गये कि एक पत्रमें उन्होंने कहा था कि ४० पठान हैं और दूसरेमें वह कहते हैं केवल २५ ही हैं । परन्तु पठानोंके बारेमें मैं ज्यादा एक दूसरे लेखमें बहुत कुछ कहूँगा । गवर्नर बारडोलीमें कर वृद्धिका औचित्य यह कहकर सिद्ध करना चाहते हैं कि ऐसी ही बढ़तीका विरोध चौरासी ताल्लुकावालोंने नहीं किया है। मैं चौरासीके बारेमें कुछ भी नहीं जानता। मगर मैं यह जानता हूँ कि हिन्दुस्तानके लोगोंने इससे पहले बहुतसे अन्याय सहे हैं और इसलिए हिन्दुओंने अपने लिये 'नम्र हिन्दू' का निन्दापूर्ण खिताब पाया है । सम्भव है कि चौरासीवाले इतने निर्बल हों कि सरकार द्वारा लगाये गये लगानका विरोध नहीं कर सकते, जब कि पिछले छ: साल स्वस्थ प्रभाव में रहकर बारडोलीवालोंने इतनी ताकत और इच्छा-शक्ति पैदा कर ली है कि वे ऐसी सरकारका विरोध करनेके कष्टोंको सह सकें, जो कि अपने अविवेक और आतंक- प्रियताके लिए बदनाम हो गई है । शेरका नंगा पंजा अब देखिए । गवर्नर साहब फर्माते हैं : सरकार शासन करनेके अपने निर्विवाद हकको छोड़कर, जैसा कि आप सलाह देते हैं, उसे किसी स्वतन्त्र समितिको क्यों दे दे ? में तो हर सम्भव उपायसे इस स्थितिको सुधारनेके लिए उत्सुक हूँ, मगर जो सरकार ऐसी बात होने दे, वह सरकार ही किस कामको ? यह शासन करनेका निर्विवाद हक है । हिन्दुस्तानका खून बेरोक-टोक निचोड़कर उसे भूखों मार डालनेका हक ! अगर सरकारी अधिकारियों और प्रजाके बीच झगड़ेका फैसला करनेके लिए कोई स्वतन्त्र समिति नियुक्त की जाये तो उसकी इस स्वच्छन्दता पर कुछ अंकुश लगेगा । यहाँ खयाल रहे कि स्वतन्त्र समितिके मानी सरकारसे बिलकुल स्वतन्त्र कोई गैर-सरकारी समिति नहीं है। इसके मानी हैं कि सरकार ऐसे लोगोंकी एक समिति बनाये जिसके बारेमें यह विदित हो कि उन पर सरकारी अधिकारियोंका दबाव नहीं पड़ेगा और उसे खुले आम जाँच करने तथा पीड़ित लोगोंकी उचित और कारगर ढंगसे सुनाई करनेका अधिकार हो। मगर ऐसी खुली जाँचके मानी होंगे सरकारकी छिपी और स्वच्छन्द लगान नीतिका "रामनाम सत्य बोल जाना।" लोगोंकी इस सरल माँगमें “सरकारके कामोंको हथियानेकी बात Gandhi Heritage Portal