टिप्पणियाँ ४६७ शर्त बनाता है तो वह अपनी शिक्षा और अपने देशको बदनाम करता है और स्त्री- जातिकी तौहीन करता है । देशमें कई युवक आन्दोलन चल रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि ये आन्दोलन ऐसे प्रश्नोंको हाथमें लें । ऐसी संस्थाएँ प्रायः आत्म-श्लाघी संस्थाएँ बन जाती हैं, जब कि उनको बनना चाहिए अन्दरसे ठोस सुधार करनेवाली संस्थाएँ । यद्यपि ये संस्थाएँ सार्वजनिक आन्दोलनोंमें सहायता पहुँचाकर कभी-कभी काफी अच्छा काम करती हैं तथापि यह स्मरण रखना चाहिए कि जनता उनके इस कार्यकी जो सराहना करती है उससे देशके युवकोंको पर्याप्त पुरस्कार मिल जाता है। यदि ऐसे कार्यके पीछे आन्तरिक सुधार न हो तो इससे युवकोंमें आत्म-तुष्टिकी अवांछनीय भावना पैदा हो जायेगी और उससे उनका नैतिक पतन होनेकी सम्भावना है । दहेजकी पतन- कारी प्रथाकी निन्दा की जानी चाहिए और उसके विरुद्ध प्रबल लोकमत बनाया जाना चाहिए और जो युवक इस प्रकार बुरे तरीकेसे लिए हुए धनसे अपने हाथोंको मलिन करते हैं उनको समाजसे बहिष्कृत किया जाना चाहिए। कन्याओंके पिताओंको अंग्रेजी उपाधियोंसे चकाचौंध में न आ जाना चाहिए और अपनी छोटी जातियोंके घेरेसे और अपने प्रान्तोंसे बाहर जाकर अपनी लड़कियोंके लिए सच्चे वीर युवक वर- रूपमें प्राप्त करने चाहिए । एक प्रशस्ति श्री एच० एस० एल० पोलकने श्री महादेव देसाईको प्रेषित एक पत्र में श्री मगनलाल गांधीके सम्बन्ध में यह लिखा है : ' लेखकने अपने पत्रके अन्तमें जो कुछ लिखा है उसकी सत्यता हम बहुतसे आश्रम- वासी अनुभव करते हैं । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया २१-६-१९२८ १. यहां नहीं दिया जा रहा है। इसमें उन्होंने यह बताया था कि श्री मगनलाल आश्रमके लिए कितने उपयोगी थे और अन्तमें कहा था कि उनका शरीर न रहनेपर भी उनकी आत्मा आपके बीच कदाचित अधिक वास्तविक रूपसे गतिशील रहेगी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९९
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