१८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय विदेशों में बहुत वर्ष बिताकर पहले-पहल जब में देश लौटा तब में भी ऐसा ही अनभिज्ञ था। पहले मुझे अपने आपको चीनी कहनेमें लाज लगती थी । किन्तु अब मुझे अपने पूर्वजोंका इतना अभिमान है कि में दर्पपूर्वक आप सभीको असभ्य समझता हूँ । देखिए, हमारी सबसे बड़ी कठिनाई आर्थिक है । जैसे कि आप अमेरीकियोंने सोचा कि अगर बहुत चीनी मजदूर आ जायेंगे तो आपके उद्योग अव्यवस्थित हो जायेंगे और आपके रहन-सहन की शैलीका स्तर गिर जायेगा । आपने तुरन्त कदम उठाया और चीनियोंका प्रवेश निषिद्ध कर दिया । मगर चीनियों पर आपके विदेशी कल-कारखानों और उनके बने सस्ते मालका आक्रमण हुआ और उनसे हमारा सर्वनाश हो गया। इससे हमारे उद्योग उसी तरह नष्ट हो गये हैं जैसे कि लाखों चीनी मजदूरोंके अमेरिका जानेसे आपके हो जाते हैं । जब में छोटा था, खुद हमारे घरोंमें भी स्त्रियां कातती और बुनती थीं। उस समय पूरी दस करोड़ चीनी स्त्रियां कातती और बुनती थीं। उसके बाद सस्ते विदेशी कपड़े आये और ये दस करोड़ औरतें बेकार हो गईं; इन्हें केवल मकी ही कमाईपर गुजर करना पड़ रहा है। हम तो आपकी भांति विदेशी मालका आना बन्द कर नहीं सकते, क्योंकि सन्धियोंके कारण हम मजबूर हैं । हमें तो थुंगी लगानेकी भी स्वतन्त्रता नहीं है। अगर में चित्रकार होता तो में व्यंगचित्र बनाकर आपको यह विला देता कि मेरी समझमें इन बेमेल सुलहनामोंका रूप कैसा है। कल्पना कीजिए कि कोई चीनी जमीनपर औंधे मुंह गिरा पड़ा है। कोई विदेशी उसपर खड़ा होकर, पैरोंसे उसे दबाये हुए है। विदेशी कहता है उठो, उठ खड़े होओ।' चीनी कहता है 'पहले अपना पैर तो हटाओ' इस- पर वह विदेशी और भी जोरोंसे दबाकर कहता है, 'नहीं, पहले तुम उठकर खड़े होओ।' अजमल जामिया कोब इन पृष्ठों में की गई अपीलके जवावमें अब तक सिर्फ निम्नलिखित रकमें प्राप्त हुई हैं :- सेठ जमनालाल बजाज श्रीयुत रामेश्वरदास, धूलिया म प्यारे अली, बम्बई रु० १०००-०-० 33 ५१-०-० १००-०-० कुल : ११५१-०-० Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०
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