५११. पत्र: जे॰ एम॰ सेनगुप्तको
आश्रम
साबरमती
२१ जून, १९२८
आगामी कांग्रेसके अध्यक्षके बारेमें आपका पत्र मिला। मुझे आपका सुझाव पसन्द है। परन्तु अन्तिम रूपमें निर्णय करनेसे पहले मैं पण्डितजी के विचार जानना चाहता हूँ। इसलिए मैंने उन्हें इस मामलेमें पत्र[१] लिखा है। जैसे ही उनका उत्तर आयेगा, मुझे आशा है कि मैं आपको और आगे और अधिक निश्चित रूपमें लिखूँगा।
प्रदर्शनी के बारेमें आपका पत्र मिला था। इससे मुझे सन्तोष नहीं है। लेकिन जाहिर है कि हमें इस मामले में असहमत होने पर ही राजी होना होगा। आपको मालूम है कि स्वदेशी के सम्बन्धमें मेरे विचार बड़े पक्के हैं। परन्तु यदि वे बंगालको पसन्द नहीं हैं तो मुझे तबतक प्रतीक्षा अवश्य करनी चाहिए जबतक बंगाल बदल न जाये या मैं धीरज न खो दूँ। बहरहाल मैं आपसे तर्क नहीं करूँगा। मैं वहाँकी गतिविधियों पर ध्यान रखूँगा। आपने मुझे जो-कुछ लिखा है और जो जानकारी मुझे मिली थी उन दोनोंमें मुझे कोई अन्तर नहीं दिखाई देता। अन्तमें संक्षेपमें इतना ही कहूँगा कि वैसे मैं मशीनोंके खिलाफ नहीं हूँ परन्तु मैं ऐसी मशीनोंके खिलाफ हूँ जो जन-समुदायसे उसका काम छीन लें और एवज में उन्हें कोई दूसरा काफी और सन्तोषप्रद काम न दें।
हृदयसे आपका,
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२६) की फोटो-नकलसे।
- ↑ देखिए "पत्र: मोतीलाल नेहरूको", १९-६-१९२८।