५१५. पत्र: देवी वेस्टको
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२२ जून, १९२८
आपका पत्र मिला और इसके साथ आया सुन्दर फोटोग्राफ[१] भी मिल गया। मैं इसे 'सुन्दर' इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि चित्र बहुत जीवन्त बन पड़ा है।
आप मगनलालके बारेमें जो कहती हैं वह बहुत सही है।
हमने आश्रम में जो परिवर्तन किये हैं, काश! उनका वर्णन करनेका मेरे पास वक्त होता। प्रभुदास पहाड़से, जहाँ वह स्वास्थ्य लाभ कर रहा था, अभी अभी आया है। कृष्णदास और छगनलाल तथा उसकी पत्नी यहाँ हैं। फिलहाल उसके माता-पिता भी यहाँ हैं। देवदास पहाड़पर है। मैं तकरीबन ठीक हूँ। यह सम्भव है कि हम अगले साल मिलें। यदि सब कुछ ठीक रहा तो शायद मैं अगले साल यूरोप आऊँ।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३९) की फोटो-नकलसे।
५१६. पत्र: होरेस जी॰ अलेक्जेंडरको
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२२ जून, १९२८
मुझे आशा थी कि मैं आपको काफी लम्बा जवाब भेजूँगा, इसलिए मैंने आपके पत्रका उत्तर देने में बड़ी देर कर दी। परन्तु मुझे लगता है कि पूरा उत्तर देनेका प्रयास करनेके लिए मुझे निकट भविष्य में पर्याप्त अवकाश मिलनेकी सम्भावना नहीं है।
मौन प्रार्थना और सामूहिक मौनके सम्बन्धमें आप जो कुछ कहते हैं, उसे मैं समझता हूँ और सिद्धान्त रूपमें उसे पसन्द भी करता हूँ।[२] जब मैं दक्षिण आफ्रिकामें था तब मैं इस तरहकी कई सभाओं में सम्मिलित हुआ था। परन्तु वे लोग कार्य-रूपमें जिस तरह इसका निर्वाह करते थे, उससे मैं बहुत प्रभावित नहीं हो सका। भारतमें