सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

४७२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय तो यह बिलकुल निष्फल सिद्ध होगा । पूजाकी कई पद्धतियाँ हैं और यदि पुरानी पद्धतियोंसे काम चल जाये तो नई पद्धतियोंका प्रयोग आवश्यक नहीं है। हम आश्रममें जो कुछ कर सके हैं, उससे मैं स्वयं सन्तुष्ट नहीं हूँ। मैं एकदम या किसी कृत्रिम रीतिसे भक्ति भावना जाग्रत नहीं कर सकता। यदि आश्रममें प्रार्थनाके समय हममें से कुछ एक लोगोंकी वास्तवमें वैसी भावना हो तो यथासमय उसका असर जरूर होगा । आश्रममें कुछ निष्ठावान् साधक हैं, जो प्रार्थनाके वक्त वहाँ उचित भक्ति-भावसे आते हैं -- इस विश्वासके कारण ही मैं बाधाओं एवं कभी-कभी गम्भीर निराशाओंके बावजूद सामूहिक प्रार्थनाको बनाये रखनेका आग्रह करता रहा हूँ। यह अपने प्रति मेरा पक्षपात हो सकता है, परन्तु मेरा अपना अनुभव है कि हमारी प्रार्थना सभाओंमें शक्ति बहुत धीरे-धीरे, परन्तु निश्चित रूपसे ज्यादा गहराई पाती जा रही है और उनकी प्रभाव शक्ति बढ़ रही है । परन्तु मुझे इस तथ्यका ज्ञान है और मुझे उसका खेद है कि हम जो प्राप्त करना चाहते हैं उससे हम बहुत दूर हैं। तो भी मैं आपके सुझाव ध्यानमें रखूंगा। मैंने उनके बारेमें पहलेसे ही मित्रोंसे चर्चा कर रखी है । ऐसा लगता है कि सफाईके मामलोंके सम्बन्धमें मेरे सुझाव मांगनेकी बातको आप ज्यादा महत्वकी नहीं मानते। मेरे विचारमें हम अकारण ही जीवनको धार्मिक और दूसरे अलग-अलग भागों में विभाजित करते हैं, जब कि यदि आदमीमें सच्ची धार्मिक भावना हो, तो यह भावना जीवनके क्षुद्रतम अंशमें भी प्रकट होनी चाहिए । मैं समझता हूँ कि हमारे-जैसे समाजमें तो सफाईका सवाल सामूहिक आध्यात्मिक प्रयत्नसे जुड़ा हुआ है। सामाजिक और राजनीतिक जीवनकी तरह ही सफाईके मामलेमें थोड़ी-सी भी अनियमितता आध्यात्मिक दरिद्रताकी निशानी है । यह लापरवाही और कर्त्तव्यकी अवहेलनाकी निशानी है। कुछ भी हो, आश्रमका जीवन- जीवनकी मूलभूत एकताकी इस धारणा पर ही आधारित है । 11 हृदयसे आपका, श्री होरेस जी० अलेक्जेंडर वृडब्रुक सेलीऑक वरमिंघम अंग्रेजी (जी० एन० १४०५) की फोटो नकलसे । मो० क० गांधी Gandhi Heritage Portal