५१७. पत्र : च० राजगोपालाचारीको आश्रम साबरमती २२ जून, १९२८ १ मैंने जमानतके तौर पर उनके इन चार प्रकाशनोंको लेकर गणेशनको कर्जके रूपमें रु० ८,५०० तककी सहायता देनेका निश्चय किया है : १. 'सत्याग्रह इन साउथ आफ्रिका, २. 'गांधीजी इन सीलोन,' ३. 'सेवन मंथ्स विद गांधीजी, ४. 'इको- नोमिक्स ऑफ खद्दर ।' परन्तु मैं चाहूँगा कि आप उनकी सहायता करें और उनका मार्ग-निर्देशन करें। उनकी तो यह इच्छा थी कि हार मान लें और प्रकाशन- व्यापारको छोड़कर बैठ जायें । परन्तु मैंने सोचा कि यह कायरता होगी और मैंने उन्हें सलाह दी है कि वह सारी कठिनाइयोंका बहादुरीसे सामना करें और मुसीबतोंसे बच निकलें । मैंने उन्हें आपका निर्देशन प्राप्त करनेकी सलाह दी है । मैंने उन्हें यह भी सुझाव दिया कि वह नटेसनकी मदद भी ले सकते हैं। परन्तु यह सब मैं आप पर छोड़ देता हूँ । यदि आप समझें कि उन्हें वैसा करना चाहिए तो आप उनका नटेसनसे, जिन्हें आप अच्छी तरह जानते हैं, परिचय करा दें । 1 वे पुस्तकें हरिलाल शर्माके पास इकट्ठी करके रखनी हैं। यदि आपको इस मामले पर कोई और सलाह देनी हो, तो मुझे बता दीजिएगा । अंग्रेजी (एस० एन० १३४३३) की माइक्रोफिल्मसे । ५१८. पत्र : एस्थर मेननको सत्याग्रह आश्रम साबरमती २२ जून, १९२८ तुम्हारे दो पत्र मिले । मगनलालकी मृत्युसे सारी योजनाएँ ही अस्त-व्यस्त नहीं हो गई हैं, उसके कारण मैं आश्रममें क्रान्तिकारी प्रतीत होनेवाले परिवर्तन करनेके लिए भी प्रेरित हुआ हूँ । इसलिए मैं तुम्हें लम्बा स्नेह-पत्र तो नहीं लिख सकूंगा । यदि सब कुछ ठीक रहा और यूरोपके मित्रोंकी मुझे वहाँ बुलानेकी इच्छा तब भी कायम रही तो मुझे आशा है कि मैं अगले साल जानेके लिए तैयार रहूँगा । १. कृष्णदासकी लिखी इस पुस्तकका नाम सेवन मंथ्स विद महात्मा गांधी था । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०५
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