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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०७

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पत्र : वेन एम० चेरिंग्टनको ४७५ मेरी राय में वक्तकी बढ़ती हुई माँग यह है कि हृदयसे सम्बन्धित चीजोंको अर्थात् नैतिक कल्याणको, जीवनमें उसका प्राप्य स्थान दिलाया जाये। इसलिए मेरे विचारमें सामाजिक विज्ञानको नैतिक दृष्टि से देखना चाहिए। पैबन्द लगानेसे काम नहीं चलेगा । इसलिए यदि आपके काममें ईमानदारी है, तो इसका उपयोग उस पद्धतिको समूल उखाड़ फेंकनेमें होना चाहिए, जिसके अधीन अमेरिकामें धनका अतुल संग्रह सम्भव हो सका है। इसलिए यदि आप मेरा सुझाव मान लें तो ऐसा मालूम होगा कि इसमें आर्थिक सहायताकी ज्यादा जरूरत नहीं रह जाती । पहले प्रश्नका जो उत्तर मैंने यहाँ दिया है, उसके बाद मुझे दूसरेका उत्तर देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है । परन्तु उक्त उत्तरको छोड़ भी दें तब भी मैं यह कहूँगा कि परम्परागत शैक्षणिक विभागों की अपेक्षा यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि आपकी यह संस्था औद्योगिक, जातीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धोंके इर्द-गिर्द संगठित की जाये । यदि पहले प्रश्नके मेरे उत्तरमें अन्तर्निहित विचारको स्वीकार कर लिया जाये तो आपको मौलिक शोध कार्यकरना पड़ेगा । पिछलेको देखते हुए इसका उत्तर अनावश्यक है। निश्चय ही बुद्धिमत्ता इसमें होगी कि सभी राष्ट्रों, जातियों और वर्गोंका प्रतिनिधित्व इसमें हो। यदि आप युवकोंका ध्यान रखें तो नागरिक अपने आपको स्वयं सुधार लेंगे । यदि आप मुझसे इस बातमें सहमत हों कि वर्तमान स्थिति असह्य है, तो मैं जिनमें काफी जगह हो, परन्तु जो बहुत ज्यादा आरामदेह न हों, ऐसे कमरोंमें कुछ प्राध्यापकों और विद्यार्थियोंको ताला लगाकर बन्द कर दूं और उनसे आग्रह करूँ कि वे वर्तमान असह्य स्थिति से बच निकलनेका मार्ग ढूंढ निकालें । इसका उत्तर में नहीं दे सकता । विचार अच्छा है । सम्भवत: [ अध्यापकों आदिके] समुचित विनिमयका या उत्तम कोटिके अतिथि सदस्य प्राप्त करनेका सबसे अधिक प्रभावशाली उपाय यह होगा कि जिन देशोंसे आप उन्हें अपने यहाँ बुलाना चाहते हैं उन देशोंमें अपना प्रतिनिधि भेजें। इस तरह आपका प्रतिनिधि सम्बन्धित देश या देशोंकी जीवन्त संस्थाओंके सीधे सम्पर्क में आयेगा । अंग्रेजी (एस० एन० १४२६२ ) की फोटो नकलसे । Gandhi Heritage Portal