५२०. पत्र : वसुमती पण्डितको आश्रम साबरमती चि० वसुमती, २३ जून, १९२८ तुम्हारा पत्र मिला । यह लिखाते समय अभी चारका पहला घंटा बजा है । जयदेवजीने नीति दोष किया था इसलिए मैंने प्रायश्चित्त स्वरूप तीन दिनका उपवास किया है। आज दूसरा दिन है। उपवास सोमवारके सवेरे पूरा होगा। मुझे थोड़ी दुर्बलताके सिवा और कुछ नहीं लगता । इसलिए तनिक भी चिन्ता करनेका कारण नहीं है। वहाँकी जलवायु माफिक आ गई है न ? कन्या गुरुकुलकी सुव्यवस्थाके लिए गुरुकुल कांगड़ी के साथ पत्र-व्यवहार चल रहा है । गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७९) की फोटो नकलसे । सौजन्य : वसुमती पण्डित ५२१. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको बापूके आशीर्वाद आश्रम साबरमती २३ जून, १९२८ चि० शान्तिकुमार, तुम्हें यह पत्र सवेरे चार बजे लिखवा रहा हूँ। इससे कल्पना कर सकोगे कि मुझे कितना काम है। महादेव चोटोंके कारण अभी तक खाट पर है । सुमन्तके विषयके कागजात मेजपर रख दिये गये हैं, किन्तु उन्हें पढ़ नहीं सका हूँ । पढ़ना तो है ही । तुमपर मुझे इतना विश्वास है कि यदि किसीके सम्बन्धमें तुम्हें सन्तोष हो गया हो तो मुझे भी होगा; यह मैं मानता हूँ । भाई सुमन्तके पत्रका मुझपर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। क्योंकि मुझे उसमें क्रोध और आवेश दिखाई दिये हैं । किन्तु पत्र पढ़ने पर मुझे जैसा लगेगा वैसा लिखूंगा। लेकिन मैं मानता हूँ कि इस विषयमें मैं भाई सुमन्तकी मार्फत या किसी दूसरे तरीकेसे तुरन्त कुछ नहीं कर सकता। इसलिए दूसरे कामोंको छोड़कर तुम्हारे भेजे हुए कागजातका निबटारा नहीं किया। ऐसा नहीं लगता कि अभी पूना जाना हो सकेगा। गया भी तो तुम्हारी झोंपड़ीमें रहनेकी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०८
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