इच्छा तो है ही। किन्तु प्रेमलीलाबहनने मुझसे अपनी झोंपड़ी में रहनेका वचन[१] कबसे ले रखा है। मैंने यही अपवाद रखा है कि यदि कामके प्रसंग में और कहीं न जाना पड़ा तो उसके यहाँ रहूँगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८७) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: शान्तिकुमार मोरारजी
५२२. पत्र: बेचर परमारको
आश्रम
साबरमती
२३ जून, १९२८
बढ़ईके लड़केका व्यापार करना ठीक नहीं माना जायेगा। शूद्र वर्णमें केवल मजदूरोंका ही समावेश होगा। मेरी दृष्टिसे बढ़ई, नाई आदि वैश्य माने जायेंगे। चौथे प्रश्नका जवाब देना अभी कठिन है। क्योंकि वर्णोंका संकर हुआ है किन्तु सामान्य रीतिसे यह कहा जा सकता है कि जो धन्धा नीतिके विरुद्ध न हो और पीढ़ियोंसे चलता आ रहा हो उसमें लगे रहना चाहिए। जिसे सत्याग्रह आश्रममें दाखिल होनेके लायक माना जायेगा, यदि उसके पास और कोई साधन न होगा तो उसके खाने-पीनेका प्रबन्ध आश्रम ही करेगा। इस समय आश्रममें बहुत-से परिवर्तन हुए हैं और हो रहे हैं, इसलिए कार्यवाहक मण्डलका आग्रह है कि किसी विशेष परिस्थितिके अतिरिक्त एक वर्षके लिए किसीको भी आश्रम में दाखिल न किया जाये। आपको नियम पसन्द हों तो आपको पहले एक वर्ष तक बाहर रहते हुए उनका पालन करना होगा। यह आप नियमावलीमें देख सकते हैं। यदि वर्षके अन्तमें आप दाखिल होना चाहते हैं तो आपको आजसे आश्रम जीवनका ज्ञान और पालन करना होगा। यदि किसी भी समय आपका आश्रममें रहनेका इरादा हो तो पहले दो-तीन दिन आश्रम में रह जाना चाहिए।
मोहनदासके वन्देमातरम्
गुजराती (जी॰ एन॰ ५५७१) की फोटो-नकलसे।
- ↑ देखिए "पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको", ९-३-१९२८।