५२३ शिक्षा-विषयक प्रश्न प्रश्न : गुजरात विद्यापीठके ध्येयोंमें लिखा है कि भारतवर्षका उत्कर्ष गाँवों पर निर्भर है, शहरों पर नहीं। अगर बात ऐसी हो तो शहरके हमारे लड़कोंको आप किसलिए बरबाद करते हैं ? गाँवके लड़कोंको आप भले ही गाँवकी शिक्षा दें। शहरके लड़के शहरी जीवन बिताना चाहते हैं । उन्हें इसके योग्य शिक्षा आप क्यों नहीं देते ? फिर विद्यापीठके लिए धन तो शहरोंमें से ही मिलता है न ? विद्यापीठको आप किसी आदर्श गांवमें ही ले जायें और गाँवोंमेंसे ही धन या अनाज और कपास माँगें तो हमें कुछ नहीं कहना है । उत्तर : सौभाग्यसे ऐसा प्रश्न बहुत-से शहरियों या शहरमें रहनेवाले विद्यार्थियोंके दिल में नहीं उठता। गाँवोंके विद्यार्थियोंको उनके खर्चसे शिक्षा दो, यह बात प्रायश्चित्त करनेके लिए तैयार शहरी मण्डलके मुंहसे कैसे निकलेगी ? विद्यापीठकी तो उत्पत्ति ही इससे हुई कि शहरियोंका ध्यान गाँवोंकी ओर गया । शहरी लोग ही अपनी आँख खुलनेके बाद विद्यापीठको चलाने लगे। अगर वह मुख्यतः गाँवोंकी सेवाके लिए ही चले तो उसे चलानेका खर्च गाँववाले ही क्यों दें? गाँवोंमें चलनेवाली शिक्षाकी व्यवस्था मी तो अभी शहरियोंको ही चलानी है। जो इलजाम शहरी लोग सरकारके विरुद्ध लगाते हैं, वही गाँववाले शहरी लोगों पर भी लगा सकते हैं, "तुम शहरवालोंने हमें लूटा है और अब भी लूट रहे हो। महज लूटना ही बन्द कर दो, तो तुम्हारी कृपा होगी । हम गई गुजरी बिसार देंगे।" हममें से कई शहरी इस वस्तुस्थितिको समझ गये और इसलिए हम चेते । हमने गाँववालोंके प्रति किया हुआ अपना भारी अन्याय समझा और इसलिए प्रायश्चित्त करनेका निश्चय किया। उसमें पहला भाग तो था, उस सरकारसे असहयोग करना, जिसकी सहायता तथा बलसे गाँवोंका सत्व हरण करनेका काम सम्भव हो सका था, और अभी हो सकता है। और दूसरा यह था कि असहयोगका गूढ़ार्थ हम ज्यों-ज्यों समझते गये त्यों-त्यों सहयोगके परिणामोंसे बचनेका रास्ता सीखते गये। अगर हम असहयोग करनेके बाद हाथपर हाथ रखकर ही बैठे रहते तो कहा जाता कि हमने असहयोगका अर्थ ही नहीं समझा है। अगर कोई हमारे घरमें से माल लूट ले जाता हो तो सिर्फ उसकी मदद न करना ही काफी नहीं होता बल्कि उसकी लूटका विरोध करना पड़ता है, उससे होनेवाले परिणामोंको त्यागना भी पड़ता है। तभी लुटेरेके साथ सच्चा असहयोग किया गया माना जायेगा । यह असहयोग हिंसक या अहिंसक, शान्त या अशान्त, पशुबलवाला या आत्मबलवाला हो सकता है । हमने अहिंसक, शान्त और आत्मबलवाला असहयोग पसन्द किया है और उससे सीखा है कि कितने ही हम शहरी गाँवोंमें से जो द्रव्य चूस कर जीते हैं और मजे उड़ाते हैं, उसके लिए प्रायश्चित्तके रूपमें हमें गांवोंकी कुछ सेवा करनी चाहिए, उनका कुछ बदला देना चाहिए। इसी विचार श्रेणीमें से विद्यापीठकी उत्पत्ति Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१०
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