शिक्षा-विषयक प्रश्न -- ४ ४७९ हुई और चूंकि हममें से कुछ लोग जाग्रत हैं, सत्यके पुजारी हैं, इसलिए दिनों-दिन असहयोगका भेद समझते जाते हैं और उस हद तक विद्यापीठका स्वरूप शुद्ध करते जाते हैं । अब यह बात समझ में आ सकेगी कि शहरियोंके दिये हुए धनका मुख्य भाग गाँवोंको शिक्षा देनेमें ही क्यों खर्च होना चाहिए। और वह शिक्षा अभी तो विद्यापीठके तैयार किये हुए शहरी स्नातकोंके ही जरिये दी जा सकती है । मेरी मान्यता तो यहाँ तक है कि हम अगर विद्यापीठके लिए मिले धनका कोई दूसरा उपयोग करें तो यह लोगोंके दिये हुए विश्वासका घात होगा। धन देने- वालोंने इस मान्यतासे धन दिया है कि उसका उपयोग चालू प्रथासे दूसरे प्रकारकी, और जैसी कि मैंने वर्णन की है वैसी शिक्षाके देनेमें होगा । प्रश्न : विद्यापीठने आठ वर्षसे अस्पृश्यता निवारणका आग्रह रखा है। इसके फलस्वरूप अबतक कितने अछूत स्नातक या विनीत तैयार हुए हैं ? उत्तर : मुझे यह प्रश्न विचित्र और अज्ञानमूलक जान पड़ता है, क्योंकि अस्पृश्यता- निवारणका यह अर्थ कभी नहीं है और न होना चाहिए कि हम अस्पृश्य कहें जानेवाले युवकोंको स्नातक अथवा विनीत बनायें। यह सम्भव है, योग्य है कि समय पाकर उनमें से कितने ही स्नातक अथवा विनीत बनें। यह भी योग्य है कि ऐसेकी मदद करनेके लिए विद्यापीठ हमेशा तैयार रहे। किन्तु अन्त्यज स्नातक बनाना अस्पृश्यता निवारणका अंग किसी तरह नहीं है । विद्यापीठने अपने अस्तित्वको ही जोखिममें डालकर, लाखों नहीं तो हजारों रुपयोंकी सहायतासे हाथ धोकर, और दूसरी सभी तरहसे सहायता करनेके लायक कितने सज्जनोंकी सेवाका लाभ त्यागकर अस्पृश्यता निवारणका अपना आग्रह और पक्षपात निबाहा है । प्रश्न : अब्रह्मचर्य से राष्ट्रमें शारीरिक और मानसिक दुर्बलता आ गई है और सतत् उद्योग तथा पराक्रम करनेका उत्साह नहीं बचा है । यह हम स्पष्ट देखते हैं । तो भी आपने विद्यापीठके ध्येयोंके अन्तिम अनुच्छेदमें ब्रह्मचर्य शब्द क्यों नहीं आने दिया ? उत्तर : यह प्रश्न ठीक पूछा गया है। यह सिद्ध नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रमें अब्रह्मचर्य से ही शारीरिक और मानसिक दुर्बलता आ गई है और उसीसे सतत उद्योग तथा पराक्रम करनेका उत्साह ढीला पड़ गया है। यह भी नहीं सिद्ध किया जा सकता कि ब्रह्मचर्य से शारीरिक दुर्बलताका नाश हो ही जाता है । इसलिए ब्रह्मचर्य जैसी अलौकिक वस्तुको व्यायामके साथ, जो चाहे जितनी अच्छी होते हुए भी क्षणिक है, जोड़कर, हलकी चीज क्यों बनायें; उसे नीचे क्यों गिरायें ? पश्चिमके लोग ब्रह्मचारी नहीं हैं, किन्तु वे इसलिए मनसे या शरीरसे दुर्बल नहीं हैं। उनका सतत उद्योग और उनका पराक्रम अनुकरणीय हैं। गुरखे, पठान, सिख, डोगरा और अंग्रेजी सिपाही शरीरसे मजबूत और हट्टे-कट्टे होते हैं, पर वे ब्रह्मचारी नहीं कहे जा सकते। वे व्यायाममें हमारी व्यायामशालाओंके विद्यार्थियोंको हरा देंगे। ऐसे अनेक दृष्टान्त देकर हम सिद्ध कर सकते हैं कि यह बात सच नहीं है कि शरीरबल, एक प्रकारका मानसिक बल, सतत् उद्योग और पराक्रम, ये चारों वस्तुएँ ब्रह्मचर्यके बिना प्राप्त हो ही नहीं सकतीं। मेरी कल्पनाका ब्रह्मचर्य ब्रह्मको दिलानेवाला, ऊपरकी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५११
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