४८० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय वस्तुओंसे परे है। यह अपने आपमें ही साधन और साध्य दोनों है, इसलिए उसके पालनके लिए मैं शरीरका होम कर देने को तैयार हो जाऊँगा । जिसे शरीरका मोह है, वह अविच्छिन्न ब्रह्मचर्यका पालन शायद ही कर सके। यहां भीष्मादिके ब्रह्मचर्यके उदाहरण लेना भूलमें पड़नेके समान है । 'महाभारत', 'रामायण' आदिमें वर्णित वस्तुओंके अक्षरको पकड़े रहनेसे हम असत्यके रास्ते चलेंगे और खाई में गिरेंगे। उनके मर्मको समझकर, उनका पालन करनेसे और उसके अनुभवमें उतरनेसे हम अवश्य ही ऊँचे बढ़ेंगे । शरीर फेंक देने लायक वस्तु नहीं है, संग्रह करने लायक है । यह अगर रावणके रहनेका स्थान बना है, तो रामकी अयोध्या भी बना है । वह कुरुक्षेत्र भी है। इसलिए हमें उसकी अवगणना नहीं करनी है। उसे आरोग्यवान, बलवान रखनेकी जरूरत है । इसलिए यह कहने में व्यायामकी प्रतिष्ठा कहाँ कम होती है कि शरीरको कसरतकी पूरी जरूरत है । और इतना कहने में सत्यका पालन होता है तथा विद्यार्थीको व्यायाम- प्रिय बनानेके लिए इतना कहना काफी है और होता रहा है। इससे उल्टे व्यायाम और ब्रह्मचर्यके बीच अनिवार्य सम्बन्ध जोड़ने जाकर हम न सिर्फ अतिशयताके ही दोषमें पड़ेंगे, किन्तु इस बातका भी पूरा भय है कि ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाला विद्यार्थी व्यायाममें पीछे रहा तो भूलमें पड़कर अपना विचारदोष सुधारनेके बदले, ब्रह्मचर्यकी निन्दा करके, उसे ही न त्याग दे । ब्रह्मचर्यको शरीरबलके आश्रय या ओटकी जरूरत नहीं है। ब्रह्मचर्यकी आवश्यकता दूसरे तरीकेसे और बहुत अधिक अच्छी तरहसे सिद्ध की जा सकती है। पश्चिमके पास शारीरिक बल, मानसिक-बल इत्यादि सम्पत्ति भले ही हो, मगर उसके पास आत्मबल कहाँ है ? जो घड़ी-घड़ी में विकारके वश हो सकते हैं ऐसे व्यक्ति हम देख सकते हैं। जो अपना विरोध जरा भी नहीं सह सकता, जिसका मनोबल, उद्योग और पराक्रम दूसरी प्रजाको लूटनेमें, उसका नाश करनेमें इस्तेमाल होता है, उसकी शरीर सम्पत्तिसे ईर्ष्या ही कैसी ? उसका अनुकरण ही किसलिए ? उसका सारा बल अब्रह्मचर्य के साथ सम्बन्ध रखनेवाला है, इसलिए वह जगतकी शुद्ध उन्नतिका घातक सिद्ध हुआ है और इसीलिए मैंने उसे राक्षसी कहा है। यहाँ मैं पश्चिमकी अवगणना करना नहीं चाहता । पश्चिममें नीतिकी, सत्यकी पूजा करनेवाले बहुत लोग पड़े हुए हैं । बहुतसे ब्रह्मचारी भी पड़े ही हुए हैं। मैं जिस दुःखद वेगका वर्णन कर रहा हूँ, उसे वे समझते हैं। इसलिए पश्चिमकी समग्र प्रवृत्तिका, परिणामोंका वर्णन हम जानबूझ कर, उनके प्रति मान और प्रेम रखकर भी कर सकते हैं। पश्चिमकी सभ्यता अगर ब्रह्मचर्यके आदर्श पर रची गई होती तो आज जगतकी स्थिति दूसरी ही प्रकारकी और दयाजनक होनेके बदले सुन्दर होती । यों जगत्के अन्दर अब्रह्मचर्य के दुःसह परिणामोंको पहचान कर, हमें ब्रह्मचर्यका आदर्श स्वतन्त्र रूपसे प्रजाके आगे रखना चाहिए। ब्रह्मचर्यके बिना आत्माका पूर्ण विकास असम्भव है । ब्रह्मचर्यके बिना मनुष्य बेलगाम हृष्ट-पुष्ट किन्तु जंगली घोड़ेके समान भले ही रहे, मगर वह सभ्य नहीं बन सकता । ब्रह्मचर्यके बिना सात्विक सतत् Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१२
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