विनाश काले ४८१ उद्योग और सात्विक पराक्रम असम्भव है। ब्रह्मचर्यके बिना मन बलवान्-सा भले ही लगे, मगर वह हजारों तरहके विकारों और प्रलोभनोंका गुलाम हो कर चलेगा । और ब्रह्मचर्यके बिना शरीर भले ही पुष्ट हो जाये, किन्तु वह वैद्यककी दृष्टिसे पूर्ण आरोग्य तो कभी पा ही नहीं सकता । शरीरकी चर्बी बढ़ाना, उसकी मांस-पेशियाँ मजबूत करना आवश्यक नहीं है। जो शरीर सूखी लकड़ी-सा होनेपर भी सर्दी, गर्मी वर्षा सभी सहन कर सकता है और जो सम्पूर्णतासे नीरोग रह सकता है, ऐसा आरोग्यवान् शरीर ब्रह्मचयंके बिना असम्भव है । यह मेरा थोड़े दिनोंका अनुभव नहीं है, किन्तु दीर्घकालका अनुभव है। मैं इसके असंख्य दृष्टान्त अपने जीवनमें से, अपने साथियोंके जीवनमेंसे दे सकता हूँ कि किस तरह एक-एक मनोविकारसे मनुष्य-शक्तिका, उसकी आत्माका हनन होता है। इसलिए मैं तो कहूँगा कि शरीर क्षीण हो तो हो जाये, तब भी आत्मार्थीको ब्रह्मचयंका पालन करना चाहिए। हमारे विद्यार्थियोंके शरीरकी और मनकी दुर्बलताके कारण जुदा ही हैं। इनमें बाल-विवाह, हम सबके दुखका कारण बाल-विवाहसे उत्पन्न सन्तान कुटुम्ब-जालका बोझा, गरीबीके कारण सात्विक खुराककी अपूर्णता या अभाव वगैरा आते हैं । बाल-विवाहको अब्रह्मचर्यमें गिनकर निकाल डालनेकी मूलमें पाठक न पड़ें। विद्यार्थियोंमें बचपनसे जो कुटेवें घर कर गई हैं, उन कुटेवोंको निकालनेके लिए जबर्दस्त प्रयत्नकी जरूरत है । समाजके घातक रिवाज सुधारे जाने चाहिए, शिक्षाका कृत्रिम बोझ कम किया जाना चाहिए। किन्तु यह विषय ही दूसरा है । इसलिए इसकी चर्चा यहाँ नहीं करूँगा । इतना ही कह दूंगा कि केवल व्यायामसे ही हमारे विद्यार्थियोंका शरीर नहीं बन सकता। सभी दिशाओंमें एक-सा प्रयत्न जब हो तभी हम यथेच्छ परिणाम पैदा कर सकते हैं। [ गुजरातीसे ] नवजीवन २४-६-१९२८ ५२४. विनाश-काले सरकार बारडोली के सम्बन्धमें जिस नीतिका आश्रय ले रही है वह कहीं उसके विनाशकालकी सूचक न हो । गवर्नर साहबने श्री मुन्शीको जो पत्र लिखा है वह दुःखजनक, दयाजनक और हास्यजनक है। यदि कोई बड़ा अधिकारी ऐसे गोममोल और लम्बे-लम्बे पत्र अपने बचावमें लिखता है तो उसके इस कामका विचार करके दुःख होता है, फिर उसपर दया आती है और अन्तमें वह दयाके योग्य तो हो नहीं सकता, इसलिए उसपर हँसी आती है । माननीय गवर्नरने इस पत्रको लिखनेमें और युक्तियाँ देनेमें अपने पूर्वगामी गवर्नरोंको मात कर दिया है और वे ज्यों-ज्यों युक्तियाँ देते गये हैं, त्यों-त्यों फँसते गये हैं । अथवा यह कहना चाहिए कि उनके जिन सचिवोंने उस पत्रका मसविदा तैयार किया, वे उनको उत्तरोत्तर फँसाते गये हैं । ये महोदय लगान बढ़ानेका समर्थन ३६-३१ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१३
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