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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१६

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५२५. पशु-सुधार आश्रम में एक दुग्धालय है और उसके अन्तर्गत पशु-सुधारका प्रयोग चल रहा है, पाठक इस बातको जानते हैं। इस प्रयोगका पूरा वर्णन प्रस्तुत करनेका समय अभी नहीं आया है। किन्तु इस प्रयोगका एक उद्देश्य अच्छे साँड़ तैयार करना भी है। ऐसे दो साँड़ इस समय आश्रम में तैयार हो चुके हैं। जिन्हें गो-सेवामें रुचि है अथवा जो अपनी गायोंकी नस्ल सुधारना चाहते हैं उनको मेरी सलाह है कि वे इन साँड़ोंको देखें और यदि उनको उनकी जरूरत हो तो मन्त्री से मिलकर उनकी कीमत वगैरा जानें। [ गुजराती से ] नवजीवन, २४-६-१९२८ ५२६. शब्द-कोश एक आश्रमवासी, आश्रम नियमावली पढ़कर व्रतोंकी नीचे लिखी टीका करते हैं और फिर खुद 'शब्द-कोष' शीर्षक देकर अपनी बनाई व्याख्या देते हैं : आश्रमके व्रतोंकी व्याख्या सम्पूर्ण होनेपर भी वे सहज ही समझमें नहीं आते हैं। यह साफ दिखलाई नहीं पड़ता कि करना क्या है, इसलिए मैंने अपनी समझ के अनुसार उनके अर्थ लिखे हैं या यों कहिए कि शब्द-कोष बनाया है । सत्य -- चाहे जहाँ हो, कृत्रिमताका त्याग करना । अपने मूल स्वभावकी खोज करनी । अहिंसा -- क्या मनुष्य, और क्या पशु, किसीको कष्ट नहीं पहुँचाना। जब-जब झगड़ोंसे क्लेश पैदा हो, तब क्लेशमें दूसरोंको शामिल करने का प्रयत्न न करते हुए, अपने आप ही सारा क्लेश झेल लेना । ब्रह्मचर्य -- -स्थूल और सूक्ष्म सभी आवेगोंको उभरते ही जला डालना, दबा लेना । सर्वव प्रसन्न रहना । पवित्र वस्तुओंमें चौबीसों घंटे एकाग्र रहना । कड़कती हुई भूख लगने पर खाने बैठना और आधे पेट ही उठ अस्वाद --- जाना। जिस खुराकको तैयार करने में बहुतोंकी मेहनत लगी हो, ऐसे भोजनके पास फटकना भी नहीं । अस्तेय - अपनी जरूरतें दिनों-दिन कमसे कम करते जाना । कलसे आजकी जरूरतें कम होनी चाहिए। Gandhi Heritage Portal