पत्र : आर० बी० ग्रेगको ४९१ मुझे क्षितीशबाबूका पत्र बहुत पसन्द आया। उसमें एक भी अनावश्यक शब्द नहीं है। मैंने जिस अप्रतिरोधका सुझाव दिया है, उसमें सर्व-साधारण जनताके लिए इस तरहके अनुदेश शामिल नहीं हैं । सस्नेह, अंग्रेजी (जी० एन० ८९१८) की फोटो नकलसे । प्रिय गोविन्द, ५३५. पत्र : आर० बी० ग्रेगको बापू सत्याग्रह आश्रम साबरमती २७ जून, १९२८ तुम्हारा पत्र मिला । संविधानके' विषयमें तुम्हारे सुझावके सम्बन्ध में मैं तुम्हारा पत्र नारायणदासके पास भेज रहा हूँ और उसकी एक प्रति शंकरलालको भी भेज रहा हूँ । महादेव अभी रोगशय्या पर पड़ा हुआ है। और अभी कुछ वक्त वैसा ही रहेगा । उसे तकलीफवाले हिस्सेमें रह-रहकर उठनेवाला तीव्र दर्द होता है । कमसे कम अक्तूबरसे पहले मेरे आश्रमसे बाहर जानेकी सम्भावना नहीं है । और तब भी अगर जा सका तो । [ पुनश्चः ] हृदयसे तुम्हारा, तुम्हारी महान् कृतिमें मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है। पता नहीं तुम्हारे पास उसके लिए समय है या नहीं। मैं समझता हूँ कि मुझे यह काम तुमपर नहीं थोपना चाहिए। परन्तु जबतक मैं वरदाचारी या महादेवसे, जो फिलहाल कामके बोझसे लदे हैं, न कहूँ, मेरी समझमें नहीं आता कि मैं और किसके पास जाऊँ । हर बार जब मैं पुस्तककी तरफ देखता हूँ, मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है । अंग्रेजी (एस० एन० १३४३४) की फोटो नकलसे । १. आश्रमका । २. इकोनोमिक्स ऑफ खद्दर । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२३
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