पर्दा दूर हुआ समझो ४९३ सकता जबतक घूंघट फाड़ कर फेंक न दिया जाये । और यह हमारा विश्वास कि यदि हमारी आधी जनसंख्याको शक्तिको, जो बनावटी तरीकेसे बन्द करके रखी गई है, मुक्त कर दी जाये तो इससे वह शक्ति पैदा होगी जो, यदि उसे सही निर्देशन दिया जाये, तो हमारे प्रान्त के लिए असीम हितकर होगी । मैं बिहार में पर्दे के बुरे परिणामोंको जानता हूँ । इस आन्दोलनको शुरू करनेमें जरा भी जल्दबाजी नहीं की गई है। इस आन्दोलनकी शुरूआत जरा विचित्र ढंगसे हुई । श्री रामनन्दन मिश्र खादी कार्यकर्ता हैं। वे अपनी पत्नीको पर्देके कैदखानेसे छुड़ाना चाहते थे। चूंकि उनके सम्बन्धी उनकी पत्नीको आश्रम में नहीं आने देते थे, वे आश्रमसे दो लड़कियोंको उसके साथ रहने के लिए ले गये। उनमें से एक, स्व० मगनलाल गांधीकी लड़की राधा बहनको उसे शिक्षा देनेका काम करना था। उसके साथ स्व० श्री दलबहादुर गिरिकी लड़की दुर्गादेवी गई थी। आश्रमकी लड़कियोंकी, श्रीमती मिश्रसे पर्दा छुड़वाने- की कोशिश इस बालिका-पत्नीके माता-पिताको बुरी लगी । इन लड़कियोंने सभी कठिनाइयोंका सामना बड़ी बहादुरीसे किया। इसी बीच मगनलाल गांधी अपनी पुत्रीसे भेंट करने और सारी कठिनाइयोंके बावजूद अपनी कोशिश जारी रखनेके लिए उसका दिल मजबूत करने के लिए वहाँ गये। जिस गाँव में राधाबहन काम करती थी, वहीं वे बीमार पड़े और पटनामें आकर उनका देहान्त हो गया । इसलिए बिहारके मित्रोंने पर्देके विरुद्ध युद्ध ठानना अपनी आनका मामला बना लिया। राधाबहन अपनी शिष्याको यहाँ आश्रममें ले आई। उसके आश्रम में आनेसे और भी हलचल मची और उसके पतिके लिए, जो पहलेसे ही तैयार थे, इस आन्दोलनमें और भी उत्साहसे भाग लेना लाजिमी हो गया । इस तरह आशा है कि यह आन्दोलन जिसमें थोड़ा-सा व्यक्ति- गत रंग है, जोरोंसे चल निकलेगा । इसके नेता बिहारके पुराने मंजे हुए सैनिक, बहुतसे संघर्षोंके नायक बाबू ब्रजकिशोरप्रसाद हैं। मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी आन्दोलनमें नेतृत्व किया हो, और फिर वह आन्दोलन बन्द हो गया हो । । अपीलमें इस पर्दा प्रथाके विरुद्ध जो कि आज बिहारकी आधी मानव-जाति पर समाज-सेवा न करनेका क्रूर अंकुश लगाये हुए है और कई मामलोंमें इसे स्वतन्त्रतासे तथा प्रकाश और स्वच्छ वायुके सेवनसे भी वंचित रखती है, जोरोंसे आन्दोलन शुरू करनेके लिए अगली ८ जुलाईका दिन निश्चित किया गया है। जितनी जल्दी हम समझ लें कि हमारी बहुत-सी सामाजिक कुरीतियाँ हमारे स्वराज्यका रास्ता रोक रही हैं, उतनी ही तेजीसे हम अपने प्रिय ध्येयकी ओर आगे बढ़ेंगे। स्वराज्य-प्राप्ति तक समाज-सुधारको स्थगित रखनेका अर्थ है कि हम स्वराज्यका मतलब ही नहीं जानते । यदि हम अपनी अर्द्धांगिनियोंको निष्क्रिय और निष्प्राण-सी रहने दें तो हम न तो अपनी रक्षा ही कर सकेंगे और न दूसरे देशोंके साथ स्वस्थ प्रतियोगिता ही कर सकेंगे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२५
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