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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२८

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प्रिय भाई, ५४१. पत्र : कुवलयानन्दको ३ फरवरी, १९२८ ' आपका कृपा पत्र मिला। मैंने यौगिक क्रियाएं कतई नहीं छोड़ी हैं। शायद शवासन में योग्य प्रकारसे नहीं कर पाता। मैं श्वास तो उसी प्रकार लेता हूँ जैसा कि आपने बताया है लेकिन मैंने अपनी खुराकमें आमूल परिवर्तन कर दिया है। धार्मिक कारणोंसे दूधके प्रति मेरी नापसन्दगी आप जानते हैं। यात्रा आदिकी बात न होनेसे मैं आहारमें मेवों और फलोंका प्रयोग करके देख रहा हूँ। इसे लगभग एक महीना हो गया है। मैं दिनमें तीन बार एक तोला दूध जैसा बारीक पिसा हुआ बादाम, अचसिके सन्तरों या मुनक्कोंके साथ लेता हूँ । दो बार आधा आधा नारियल पीसकर और निचोड़कर उसका दूध निकालकर अधसिके कच्चे पपीते या कच्चे केलेके साथ लेता हूँ । कच्चा केला मैंने आज ही शुरू किया है। इस परिवर्तनके बादसे मैंने कोई सारक दवा नहीं ली है और कोठा पहलेसे कहीं अच्छा है । शायद आप यह परिवर्तन पसन्द नहीं करते। लेकिन यदि आप मुझे बर्दाश्त करके मेरा मार्गदर्शन कर सकें तो कृपया अवश्य करें। यदि आप कोई और आसन सुझाना चाहते हों तो कृपया सूचित करें। डा० मुथुकी सलाह पर मैंने एक महीनेसे रक्तचापकी जांच बिलकुल करवाई ही नहीं है । अंग्रेजी (जी० एन० ५०५४) की फोटो नकलसे । हृदयसे आपका, मो० क० गांधी १. साधन- सूत्रमें “३-१-१९२८ " दिया है। लगता है कि गलतीसे ३-२-१९२८ के बजाय यह तारीख दे दी गई है। गांधीजीने ३१ दिसम्बर १९२७ को आश्रम लौटनेके बाद खूराक सम्बन्धी प्रयोग शुरू किया होगा। एक महीनेसे चल रहे प्रयोगके उल्लेखसे लगता है कि यद पत्र ३ फरवरी, १९२८ को लिखा गया था । Gandhi Heritage Portal