४९८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कुछ सर्वोत्तम कार्यकर्ता इस अपेक्षाकृत अधिक रोचक परन्तु व्यर्थके काम में तन [ मन ] से लग जायेंगे । असहयोगसे पहलेका विदेशोंमें प्रचारकार्य मुख्य रूपसे ब्रिटेन तक ही सीमित था। लेकिन इन आठ वर्षोंके प्रयत्नोंका एक स्थायी परिणाम यह हुआ है कि ब्रिटेन भी विश्वास खो बैठा है। जो कुछ रहा सहा विश्वास ब्रिटिश मजदूर दलको था, वह भी खत्म हो गया है । इसलिए विदेशों में प्रचारकी मांगका वर्तमान स्वर इंग्लैंडमें प्रचारके लिए नहीं बल्कि अन्य विदेशी राष्ट्रोंसे सम्पर्क और मंत्री बढ़ानेके लिए है। हमें बताया जाता है कि जर्मन और रूसी लोगोंसे घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित करना नितान्त वांछनीय है। हमें बताया जाता है कि यूरोपकी लैटिन जातियोंमें प्रचारके लिए अनुकूल क्षेत्र है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगालका उल्लेख किया जाता है। महत्व- पूर्ण निष्पक्ष क्षेत्र होनेके कारण स्केन्डिनेवियाको भी नहीं भुलाया जाता। फिर हमें यह भी बताया जाता है कि यह आजकी मांग है कि भारतका उन देशोंसे नाता जोड़ा जाये जो इसी तरहके साम्राज्यवादी शोषणसे कष्ट भोग रहे हैं। हमें आश्वासन दिया जाता है कि भारतकी आशा ऐसे संघ-बद्ध एशियामें निहित है जो पश्चिमी आधिपत्यके विरुद्ध सिर उठाये। विदेशोंमें प्रचार सम्बन्धी रुखमें हुई इस तबदीलीकी प्रतिध्वनिका अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी कार्यवाहियोंमें सुनाई देना स्वाभाविक था, जहाँ वातावरणमें विदेशी मामलोंकी प्रधानता थी । वहाँ कई ऐसे प्रस्ताव स्वीकार किये गये जो अन्तर्राष्ट्रीय मैत्रीकी नींव डालने के उद्देश्यसे प्रस्तुत किये गये थे । यदि हमारे हालात बेहतर हों और हम अन्य राष्ट्रोंसे मेलजोल रखनेसे इनकार कर दें तो वास्तवमें यह हमारी संकुचित मनोवृत्ति होगी। इससे यह व्यक्त होगा कि हममें, संस्कृति और भाई चारेकी भावनाकी कमी है। लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में जो चीज सभ्यता और संस्कृति तथा उदार मनोवृत्तिकी द्योतक होगी वही मौजूदा हालातों में केवल विवशताको प्रकट करेगी और उससे कुछ लाभ नहीं होगा । अन्य राष्ट्रोंसे मैत्री केवल तभी बढ़ सकती है और लाभप्रद हो सकती है, जब जैसा कि व्यक्तिगत मैत्रीमें भी होता है, एक ही पक्ष द्वारा सारे लाभ पानेकी आशा उसका आधार न हो। यदि हम अन्य लोगोंसे सम्मानजनक मंत्री चाहते हैं तो जहां हम उनसे कुछ पाना चाहते हैं वहां उन्हें देनेके लिए हमारे पास भी कुछ होना चाहिए। यदि हम वास्तवमें दूसरोंकी मदद नहीं कर सकते और केवल उनसे ही कुछ पाना चाहते हैं तो पारस्परिक आदरभाव नहीं बढ़ेगा और न स्वस्थ मैत्री ही पनप सकती है । यदि हम सचमुच दूसरोंकी मदद कर सकते हैं तो वह केवल राष्ट्रीय अधिकारों की दृढ़तापूर्वक मांग करनेके लिए महान प्रयत्नके बाद ही सम्भव है। और यदि सही दिग्दर्शन कराया जाये तो इससे स्वदेशमें प्रभावशाली परिणाम निकल सकते है और अवश्य निकलेंगे। जिन राष्ट्रोंसे हम मंत्री चाहते हैं उन्हें हमारे निकट सम्बन्धसे सीख सकने लायक कुछ दिखाई देना चाहिए या कुछ लाभकी सम्भावना होनी चाहिए। यदि हमारे बीच कोई बहुत बड़े महत्वका आन्दोलन चल रहा हो या कोई क्रान्तिकारी प्रयत्न हो रहा हो या कोई ऐसा बड़ा रचनात्मक काम हो रहा हो Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३०
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