परिशिष्ट ४९९ जिससे दूसरा कुछ सीख सके या जिसका अध्ययन कर सके तो यदि हम बराबरीके दर्जेकी नहीं तो सम्मानजनक शर्तोंपर मैत्रीकी अपेक्षा कर सकते हैं। लेकिन हम सदैव अपनी पुरातन संस्कृति या गांधीवादी आन्दोलनके इतिहासपर ही आश्रित नहीं रह सकते । केवल दासताके सूत्र पर मैत्रीके सच्ची या लाभप्रद होनेकी सम्भावना नहीं है। हम रूस, चीन या तुर्कीकी तरफ क्यों झुकते हैं ? केवल इन राष्ट्रोंके विगत इतिहासकी महानता ही हमें आकर्षित नहीं करती। यदि उनकी केवल यही देन हो तो उनमें हमारी दिलचस्पी नहीं बचेगी। लेकिन, चूँकि हमारा यह विश्वास है कि उन देशोंमें आजकल महान आन्दोलन चल रहे हैं जिनमें हमें उपयोगी अव्ययनकी सामग्री मिलती है । या उनकी किन्हीं चीजोंपर गौर करें तो हम उनपर मुग्ध हो सकते हैं, इसलिए हमारे कुछ लोग उन देशोंको जाते हैं । इसी तरह यदि हम ऐसे राष्ट्रोंसे अन्तर्राष्ट्रीय मंत्री चाहते हैं तो हमारे पास उन्हें देनेको कुछ मूल्यवान वस्तु होनी चाहिए। अन्यथा हम केवल भिखारी होंगे और हमें अपने साथ किसी भिखारी से किये जानेवाले बर्ताव से बेहतर बर्तावकी आशा नहीं करनी चाहिए। लेकिन फिर यह कहा जा सकता है कि यह तो विश्व राजनीतिकी उपेक्षा करना है । युद्ध हो रहे हैं । विश्वके राष्ट्र बराबर एक दूसरेकी योजनाओंको निष्फल बनानेको तत्पर हैं और इस फलकपर भारत एक महत्वपूर्ण मोहरा है । हम अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिसे उतने लाचार नहीं हैं जितने आन्तरिक दृष्टिसे अपने खुदके मामलोंमें हैं। इसके लिए आवश्यकता उलझनें मिटाने और सीधी-सच्ची बातचीत करनेकी है। क्या हम युद्ध करना चाहते हैं और क्या हम उन लोगोंसे मैत्री करना चाहते हैं जो इंग्लैंड से युद्ध कर सकते हैं या क्या हम अन्य राष्ट्रोंसे आशा करते हैं कि वे हमारी खातिर युद्ध करेंगे। यदि विदेशी शक्तियाँ युद्ध करती हैं तो वे उसमें गोला- बारूद तथा जहाजोंका भी उपयोग करेंगी। क्या कभी ऐसे युद्धमें एक राष्ट्रके रूपमें उपयोगी ढंगसे हमारे भाग लेनेकी सम्भावना है ? क्या ऐसी कोई कल्पना की गई है कि भारत तथा पूर्वके अन्य गुलाम राष्ट्र भविष्य में किसी भी समय ऐसी संधि कर सकते हैं जिसके द्वारा एक दूसरेकी सहायता करते हुए वे सबके समान शत्रुके प्रति विद्रोह कर दें ? क्या भारत ऐसी आशा कर सकता है कि यदि विश्व-युद्ध में ऐसी कोई जरूरत पड़े तो वह इंग्लैंडके विरुद्ध युद्ध करनेवाली किसी शक्तिको सक्रिय सहायता देगा ? और क्या एक ही दलील दें तो हमारे इस तरहकी कोई बात हासिल कर पानेकी गुंजाइश है ? इस स्थितिमें जब कि हम निशस्त्र हैं, क्या इसे थोड़ी-सी भी व्यावहारिक राजनीति कह सकते हैं ? शायद इस पर यह कहा जाये कि हम शस्त्र नहीं चाहते; हम निष्क्रिय प्रतिरोध द्वारा बहुत कुछ कर सकते हैं। युद्ध अथवा शान्ति कालमें ब्रिटिश सरकारसे असहयोग करना ही हमारे हाथमें एक मात्र अस्त्र है। तब फिर हम अपनी पुरानी स्थितिपर वापस आ जाते हैं। इंग्लैंडके विरुद्ध भारतका युद्ध यदि अहिंसात्मक उपायोंसे ही होना है तो इसका अर्थ यह है कि वह पूर्णतया देशकी अपनी ताकत पर निर्भर Gandhi Heritage Portal
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