इसके विरोध में बारडोलीके परिशिष्ट ५०३ किसानोंका कहना है कि ताल्लुकेका पूरी हदतक उसमें और बढ़ोतरीकी कतई कोई बात नहीं है । मानके अनुसार इस प्रकार विभाजित हैं : कर निर्धारण हो चुका है तथा ताल्लुकेके किसान अपनी भूमिके १ से ५ एकड़ तक ६ से २५ २५ एकड़ तक २६ से १०० एकड़ तक १०,३७९ ५,९३६ ८२९ ४० १०१ से ५०० एकड़ तक निरापद रूपसे ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि वे सभी किसान, जिनके पास २५ एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं है, खुद काश्त करते हैं और जिनके पास ज्यादा जमीन है वे अपनी जमीन बटाई पर किसानोंको दे देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि १६,३१५ किसान वास्तव में कुल १,२७,०४५ एकड़के क्षेत्र में खुद काश्त करते हैं । याने कि हर किसान औसतन लगभग आठ एकड़ भूमिमें खेती करता है । यह न्यायसंगत नहीं है कि निर्णय किरायोंके आधार पर हो - चाहे वे लाभकर या अलाभकर हों और जिनका उपभोग केवल बहुत कम लोग अर्थात ८६९ बड़े जमींदार ही करते हैं । १६,३१५ किसानोंके पास जो जमीन है उसके मूल्य तथा भूमिकर कानूनकी धारा १०७ के अधीन मुनाफोंका जो लाभ वे उठा रहे हैं उसे ध्यानमें रखते हुए भूमिकर निर्धारण किया जाना चाहिए था। बारडोलीके किसान दलील देते हैं कि फी एकड़की औसत उपजको व्यानमें रखते हुए और भूमिकर अधिकारी द्वारा स्वीकृत बहुत ऊंचे दर्जेके मूल्योंको सही मानकर (यद्यपि रिपोर्टके बादसे मूल्य काफी गिर गये हैं) ८ एकड़ जमीन में खेती करनेवाले किसानको इतना मुनाफा नहीं होता कि सरकार मौजूदा कर निर्धारणकी दरमें बढ़ोतरी कर सके। वे इस कथनको सिद्ध करनेको तैयार हैं और उनका कहना है कि यदि मुनाफोंके ५० प्रतिशतको भी आधार माना जाये तो भी किसी बढ़ोतरीकी जरूरत नहीं है और यदि मुनाफोंके २५ प्रतिशतको आधार माना जाये तो लगानकी मौजूदा दरोंमें काफी कटौती करना जरूरी होगा । इस प्रकार वे अपनी दलीलके लिए ताल्लुकेकी वास्तविक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं; लेकिन उनकी इस दलीलका आधार सरकारी रिपोर्टोंके महत्व और यथार्थताका संदेहास्पद माना जाना भी हैं। अस्तु उनका कहना है कि भूमिकर अधिकारी श्री जयकरने कोई खास पड़ताल नहीं की । उन्होंने कुछ एक गाँवोंका दौरा किया, गांववालोंको लगान बढ़ानेके प्रश्नके बारेमें कोई अभ्यावेदन देनेके मौके नहीं दिये, और सरसरी तौर पर एक सर्वेक्षण तैयार किया। उन्होंने नितान्त आवश्यक आँकड़े बिना जरा भी जाँच किये अपने कार्यालय में तैयार किये और अपनी ३० प्रतिशतकी सिफारिशोंके लिए वह कुल पैदावारके मूल्यमें बढ़ोतरी पर निर्भर रहे। श्री जयकरकी जाँच पड़ताल यदि उसे जाँच पड़ताल कहा जा सकता है, जिस लापरवाहीसे तैयार की गई है, वह उसे निरर्थक बनानेके लिए काफी है। लेकिन श्री एन्डरसनने एक अन्य बहुत ठोस आधार पर श्री जयकरकी रिपोर्ट पर शंका व्यक्त की जिसकी ओर जनताके प्रतिनिधियोंने भी ध्यान दिलाया था । उन्होंने Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३५
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