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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१०३

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पत्र : रामनारायण पाठकको

सामाजिक सम्मेलनके सम्बन्धमें, मुझे सम्मेलनके लोगोंकी ओरसे एक पत्र मिला था और मुझे मजबूरन 'ना' कहना पड़ा था ।[]

जब मैं कलकत्ता आऊँगा तब प्रतिष्ठानके कार्य-कलापकी जाँच करूँगा और देखूंगा कि उसके बारेमें क्या-कुछ किया जा सकता है ।

मुझे खुशी है, बैजनाथजी[] आपके निकट आ रहे हैं। वे एक नेक दिल आदमी हैं और सक्रिय सेवा करना चाहते हैं। उन्हें तो मैं यही सुझाव दूँगा कि या तो वे वर्धा आकर अपनी योजनापर बातचीत करें अथवा बातचीतको तबतक के लिए स्थगित रखें जबतक मैं कलकत्ता न आऊँ । एक ही कठिनाई है कि कलकत्ता में निश्चिन्त होकर बातचीतका समय शायद न मिल पाये । बैजनाथजीसे जिरह किये बिना और यह जाने बिना कि उनके मनमें क्या है, मेरे लिए कोई योजना तैयार करना मुश्किल है ।

कृष्णदास आपके साथ है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। उम्मीद है, उसका स्वास्थ्य ठीक चल रहा होगा । उससे मेरा स्नेह कहेंगे । यदि सोदपुरकी आबोहवा उसे अनुकूल बैठे तो मैं चाहूँगा कि वह कुछ समयतक आपके साथ रहे ।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्त
खादी प्रतिष्ठान, सोदपुर
अंग्रेजी (एस० एन० १२७९३) की फोटो-नकलसे ।
 

७८. पत्र : रामनारायण पाठकको

१७ नवम्बर, १९२८

भाई रामनारायण,

तुम्हारा पत्र मिला । [ गु] फामें बैठना भी एक क्रिया तो है ही । उसमें भी आसक्ति आदि दोषोंकी सम्भावना है। जबतक शरीर है तबतक काम तो रहेंगे ही। देशसेवाके कार्यमें आसक्ति आदि होनी ही चाहिए यह जरूरी नहीं है। हम अपने जो दोष दिखाई दें उन्हें कम करनेका प्रयत्न करें, इसी में पुरुषार्थ है ।

बापूके आशीर्वाद

श्री रामनारायण नागरदास पाठक

श्री गांधी अन्त्यज आश्रम

छाया (पोरबन्दर)
गुजराती (सी० डब्ल्यू २७८४ ) से ।
सौजन्य : रामनारायण पाठक
  1. १. देखिए " पत्र : सत्यानन्द बोसको”, ९-११-१९२८ ।
  2. २. बैजनाथ केडिया ।