९७. तार : घनश्यामदास बिड़लाको
अहमदाबाद
२२ नवम्बर, १९२८
बिड़ला पार्क, कलकत्ता
कल सवेरे वर्धा के लिए रवाना हो रहा हूँ। अब मैं वर्षामें आपके और मालवीयजीके उत्तरकी बाट जोहूँगा । इस विपत्तिको[१]ध्यान में रखते हुए मैं चाहूँगा कि यदि सम्भव हो तो आप जल्दी से जल्दी वर्धा चले आयें।
गांधी
- अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ७८७९) से ।
- सौजन्य : घ० दा० बिड़ला
९८. पत्र : छगनलाल जोशीको
२३ नवम्बर, १९२८
चि० सन्तोक मेरे[२] सुझाये हुए १२ रुपये में निर्वाह करनेके नियमका पालन करनेमें अभी असमर्थ है इसलिए उसने चि० राधा[३] और रुखीके[४] और रुखीके साथ राजकोटमें रहनेका निश्चय किया है। उसका कहना है कि राजकोटमें उसे प्रति मास ६० रुपयेकी जरूरत होगी। यह रकम मुझे बहुत ज्यादा लगती है; तो भी मैं उसका जी दुखी नहीं करना चाहता, इसलिए मैंने इतनी रकम भेजने की बात मान ली है । रातके समय विचार करते हुए मुझे लगा कि यह रकम पेन्शनके तौरपर मानी जाये और उसे आश्रमके खाते में डाल दें; यही सबसे सीधा मार्ग है।
मैं यही उम्मीद करता हूँ कि चि० सन्तोक और बालिकाएँ इस रकमको बादमें कम कर सकेंगी ।
यह निर्णय करते समय मैंने मनमें संकोचका अनुभव किया और दुखका भी । अभी तो मैं यह सोचकर सन्तोष माने ले रहा हूँ कि वे किसी दिन आश्रमके आदर्शको मनसे स्वीकार करेंगी और आश्रम में आकर रहने लगेंगी ।