तो फिर गंगामें क्या पवित्रता रह जायेगी ? इसलिए हम तपश्चर्या करके, सत्यकी खातिर कष्ट सहन करके अपने पंचोंको शुद्ध बनायें। यही काम जमनालालजी कर रहे हैं। अगर आप उनकी राहपर नहीं चल सकते तो कमसे कम उन्हें अपना आशीर्वाद तो दीजिए ही । क्योंकि एक दिन ऐसा आयेगा जब केवल आप ही नहीं, बल्कि कट्टर रूढ़िवादी भी यह स्वीकार करेंगे कि अपने इस कार्यके द्वारा जमनालालजीने हिन्दू धर्मकी सबसे बड़ी सेवा की है। भावी पीढ़ियाँ इसके लिए उनका आभार मानेंगी।[१]
- [ अंग्रेजीसे ]
- यंग इंडिया, १३-१२-१९२८ ।
१०९. जीवनमें संगीत
कालेजके विद्यार्थियोंके प्रश्नोंमें आखिरी प्रश्न यह है :
संगीतका आपके जीवनपर क्या असर हुआ है ?
संगीतसे मुझे शान्ति मिली है । मुझे ऐसे मौके याद हैं, जब मैं किसी कारण परेशान था और जब संगीत सुननेसे मनको शान्ति मिली थी । यह भी अनुभव हुआ है कि संगीतसे क्रोध मिट जाता है। ऐसे तो कई उदाहरण याद हैं कि गद्यमें लिखी हुई चीजोंका असर नहीं पड़ा और उन्हींके बारेमें भजन सुननेपर मनपर उनका असर हो गया। मैंने यह भी देखा है कि भजनके बेसुरे गाये जानेपर उसके शब्दार्थने मुझे नहीं छुआ। और जब वही भजन मधुर सुरमें गाया गया, तो उसमें भरे हुए अर्थका असर मनपर बहुत गहरा हुआ । 'गीता' जब मीठी आवाजमें एक सुरसे गायी जाती है, तब मैं उसे सुनते-सुनते थकता ही नहीं, और गाये जानेवाले श्लोकोंका अर्थ दिलमें ज्यादा ज्यादा गहरा पठता है। मीठे स्वरमें जो 'रामायण' बचपनमें सुनी थी, उसका असर अवतक चला आ रहा है। एक बार एक मित्रने 'हरिनो मारग छे शूरानो ' भजन गाया, तो उस बार उसका जैसा गहरा असर हुआ, वैसा पहले कई बार सुन चुकनेपर भी नहीं हुआ था । सन् १९०७ में ट्रान्सवालमें मुझे आक्रमणके कारण बहुत चोट आई थी। डाक्टर घावोंपर टाँके लगाकर चला गया था। मुझे दर्द हो रहा था । जो दुःख मैं स्वयं गाकर या मनन करके नहीं मिटा सकता था, वह ओलिव डोकसे एक मशहूर भजन सुनकर मैं भूल गया । यह बात 'आत्मकथा' में लिखी जा चुकी है ।
मेरे यह लिखनेका कोई यह मतलब न लगा ले कि मुझे संगीत आता है । यह कहा जा सकता है कि संगीतका मेरा ज्ञान नहीं के बराबर है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि मैं संगीतकी अच्छाई-बुराईकी परीक्षा कर सकता हूँ। यह ईश्वरकी देन ही है कि कोई-कोई संगीत मुझे अच्छा लगता है या अच्छा संगीत मुझे अच्छा लगता है ।
- ↑ १. यह १६-१२-१९२८ के नवजीवन में भी छपा था ।