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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१३५

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हमारा कर्त्तव्य

ताल्लुका अथवा हलका अपना हिस्सा खुद तय करे, जो किसी हालत में आबादीको देखते हुए एक न्यूनतम राशिसे कम न हो। उसे यह भी तय कर लेना चाहिए कि अमुक तिथितक वह अपने हिस्सेकी पूरी रकम इकट्ठी कर लेगा । मैं यह भी सुझाव देता हूँ कि प्रत्येक सभामें स्वराज्यकी दृष्टिसे कुछ-न-कुछ रचनात्मक कार्य करनेका प्रस्ताव भी पास किया जाना चाहिए। इस कार्यको सम्पादित करनेके लिए स्थानीय कार्यकर्त्ता सबसे उपयुक्त हो सकते हैं, बशर्ते कि उनमें उस प्रस्तावको क्रियान्वित करनेका संकल्प हो । यदि ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जाता तो इससे दिवंगत देशभक्तकी स्मृतिका कोई अनादर नहीं होगा, लेकिन जबतक हम उनकी स्मृतिको एक ऐसी पवित्र धरोहर मानते हैं जिसके प्रति हमारे कुछ कर्त्तव्य हैं तबतक ऐसे प्रस्ताव पास करके उन्हें भूल जाना उनकी स्मृतिका अनादर करना होगा ।

मो० क० गांधी

[ अंग्रेजी से ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, २८-११-१९२८
तथा (एस० एन० १३३४० और १३३४१ ) की फोटो-नकलसे ।
 

११८. हमारा कर्त्तव्य[]

२७ नवम्बर, १९२८

मुझे आशा है कि कांग्रेस अध्यक्ष डॉ० अन्सारी, भारतभूषण पं० मदनमोहन मालवीय और सेठ घनश्यामदास बिड़लाने लालाजीके स्मारकके सम्बन्धमें लोगोंसे जो अपील की है, वे उसका पूरा और तत्काल उत्तर देंगे । अंग्रेजीमें एक कहावत है जिसका अर्थ है कि जो तत्काल देता है वह दूना देता है । हमारे यहाँ भी ऐसी कहावत है, 'तुरन्त दान महा कल्याण ।' ये दोनों विभिन्न देशोंके ज्ञानियोंके अनुभवकी सूचक हैं । हम इस कहावतको भूल गये हैं। आज तो हमारे सम्बन्धमें यह कहा जाता है कि हम सदा विलम्बसे जागते हैं अर्थात् ठीक समयपर दान देने या काम करनेकी बजाय समय बीतनेपर उतावलीमें हतबुद्धिसे होकर कुछ थोड़ा-बहुत दान देते या काम करते हैं। इससे उस दान या कामकी शोभा जाती रहती है और उसकी कीमत आधी रह जाती है । मुझे आशा है कि इस स्मारकके सम्बन्धमें ऐसा नहीं हो सकेगा । लालाजी जैसे लोकप्रिय नेताके स्मारकके लिए तो माँगते ही धन मिल जाना चाहिए ।

आशा है, ऐसी आपत्ति कोई नहीं करेगा कि अपीलपर तीन ही लोगोंके हस्ताक्षर क्यों हैं ? अधिक नामोंको पाने में कठिनाई हो रही थी और यदि देर की जाती तो २९ तारीख निकल जानेका भय था । फिर ऐसे काम में ढिलाई करना भी खतरनाक होता है ।

  1. १. देखिए “लालाजी स्मारक," २९-११-१९२८ भी।