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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१४०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

पर खर्च किये जानेवाले हर आनेका मतलब गरीबोंको उससे वंचित करना होगा । सम्बलपुर समितिको भी मेरी इस मनःस्थिति से अवगत करा दें ।

अब देखता हूँ कि जिस पत्रके बारेमें मैं यह सोचे बैठा था कि मैं आपको भेज चुका हूँ, वह कभी भेजा ही नहीं गया। अब मैं उसे अनुवाद करवाकर आपको भेजनेकी कोशिश कर रहा हूँ ।

हृदयसे आपका,

अंग्रेजी (एस० एन० १३७३६) की माइक्रोफिल्म से ।
 

१२३. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको

सत्याग्रहाश्रम, वर्धा
२७ नवम्बर, १९२८

प्रिय सतीश बाबू,

आपके दो पत्र मिले। आपने वैद्यनाथजी के बारेमें जो कहा है, उसे मैंने ध्यानमें रख लिया है।

हाँ, राजेन्द्रबाबूने 'क्रॉनिकल' में अनिल बाबूके लेखोंका उत्तर दिया है। उन लेखोंका आपकी तरफ भले ही कुछ असर न हुआ हो, लेकिन बम्बई में उनका कुछ असर हो सकता है -- विशेष रूपसे इसलिए कि 'क्रॉनिकल' ने उनके लेखोंको प्रमुख स्थान दिया। लेकिन मैं आपकी इस बात से पूर्णतया सहमत हूँ कि आम तौर पर विरोधका आभास देनेवाले इस तरह के निरर्थक लेखोंकी उपेक्षा करने में कोई हर्ज नहीं है ।

प्रदर्शनीको लेकर तो मेरी उलझन बढ़ती ही जा रही है। मोतीलालजीने मुझे लिखा है कि प्रदर्शनी कैसी होनी चाहिए, इसके सम्बन्ध में समितिने मेरा विचार स्वीकार कर लिया है। लेकिन अभी तक मुझे डॉ० विधानका कोई पत्र नहीं मिला है । इसलिए कल उन्हें तार[] दिया है और अब उनके उत्तरकी राह देख रहा हूँ । आपने मुझे जो कतरन भेजी है, वह सचमुच बुरी है ।

कृष्णदासके बारेमें जानकर दुःख हुआ । उससे कहिए कि उसे भला-चंगा और मजबूत हो जाना चाहिए। कलकत्ता आनेपर मैं उसे स्वस्थ देखना चाहता हूँ ।

सामूहिक रसोईके सम्बन्धमें आपकी प्रगति उत्साहवर्धक है ।

अब हमने आश्रम में अपनी बेकरी तैयार कर ली है। आपको याद होगा कि मैंने आपसे इसकी चर्चा की थी। इसमें तैयार की गई डबल रोटी खूब अच्छी बनी

  1. १. देखिए “तार : डॉ० विधानचन्द्र रायको", २६-११-१९२८ ।