बा मनुके विषय में चिन्ता करती रहती है। उसके बाल कौन घोता-सँवारता है । उसके कपड़ोंका क्या होता है, आदि अनेक प्रश्न करती है। इन सबमें तुम या कोई और मदद करता होगा -- ऐसा मैंने बा से कहा है ।
सरोजिनी देवी अपने हिस्सेका काम करती ही होगी। क्या वह प्रसन्न रहती है ?
मेरा एक रूमाल वहाँ रह गया है । प्रभावतीको मालूम होगा। देख लेना । अगर मिल जाये तो सँभाल कर रख लेना ।
स्वास्थ्य ठीक न रहे यह तो उचित नहीं है ।
सूरजबनके[१] लिए मैंने तो तुरन्त तार भेज दिया था । किन्तु वह क्यों नहीं मिला, यह तो ईश्वर ही जाने ।
बापूके आशीर्वाद
- गुजराती (जी० एन० १८५४) की फोटो-नकलसे ।
१२५. पत्र : छगनलाल जोशीको
२७ नवम्बर, १९२८
तुम्हारे दोनों पत्र मिल गये हैं । चि० संतोक जो अनाज दे उसका पैसा उसे नहीं मिल सकता । यह अनाज तथा और भी जो अनाज उसके पास हो, वह आश्रम-की सम्पत्ति है । यह बात चि० रुखी वगैरहको धीरजपूर्वक समझाना या नारणदाससेसमझानेको कहना । अगर सत्यके साथ प्रेमका मिश्रण होगा तो तुम्हारा निर्णय ठीक ही होगा। लेकिन भूल होनेके भयसे अपना धर्म न छोड़ना ।
नारणदासके यहाँसे लोग निकलते जा रहे हैं । वहाँ बदलेमें और लोगोंको रखना हो तो रखना। तुम दोनों एक-हृदय हो सको, यह बहुत आवश्यक है । कैसे हो सकते हो, यह तुम जानो ।
... [२] बहनके विषय में तुम जो लिख रहे हो वैसा तो गंगाबह्नने मुझसे कभी कुछ कहा नहीं । तुमने जो लिखा है, उसने तो मुझे चौंका दिया है। इस सबके बावजूद हमें निर्लेप रह कर बहनोंकी सेवा करनी है । श्रीपतराव रह जायें तो बहुत अच्छा हो । दूधके सम्बन्धमें कल लिखनेका विचार है । आज घीका इन्तजाम कर रहा हूँ । लेकिन, अभी कुछ पक्का नहीं है ।
बापूके आशीर्वाद
- [ गुजराती से ]
- बापुना पत्रो : श्री छगनलाल जोशीने