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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१४८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

तो उसका मतलब सारे प्रयत्नोंका मागें ही बन्द कर देना होगा । कर्मका सिद्धान्त तो सतत क्रियाशील रहता है, वह एक अविराम सतत प्रक्रिया है; लेकिन स्पष्ट ही आपने और आपकी बहनने यह मान लिया कि कुछ कर्मोंने अपना प्रभाव डालना शुरू किया और उनका वह प्रभाव एक निश्चित दिशामें निर्बाध रूपसे पड़ता चला गया और जो दूसरे कर्म किये गये उनका प्रभाव उन कर्मोके प्रभावकी दिशामें कोई परिवर्तन नहीं कर पाया। तथ्य यह है कि प्रकृतिका एक-एक व्यापार कर्मके नियममें निरन्तर हस्तक्षेप करता रहता है। खुद यह नियम ही ऐसे हस्तक्षेपकी सुविधा देता है । कारण, यह नियम कोई निर्जीव, कठोर और निष्क्रिय चीज नहीं है; बल्कि यह तो एक सजीव और सतत विकासशील प्रबल शक्ति है ।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत टी० के० श्रीनिवासन

शक्ति निलयम, पलैयूर

बरास्ता - मुतुपेट
अंग्रेजी (एस० एन० १३३०७ ) की फोटो-नकलसे ।
 

१३१. पत्र : लाला गिरधारीलालको

सत्याग्रहाश्रम, वर्धा
२८ नवम्बर, १९२८

प्रिय लाला गिरधारीलाल,

मुझे आपका लम्बा तार मिला था, और अब एक लम्बा पत्र भी मिला है; जो आपने साबरमतीके पतेपर भेजा था और वहाँसे फिर मुझे भेजा गया है । सम्भवतः यही कारण है कि 'ट्रिब्यून' की कतरन मुझे नहीं मिली है और मैं अब तक उसे नहीं देख पाया हूँ । लाला जगन्नाथ मुझे बताते हैं कि उन्होंने 'ट्रिब्यून' अथवा किसी अन्य समाचारपत्रको कोई तार नहीं भेजा है । कतरन में क्या लिखा है, यह जाने बिना मेरे लिए उसके बारेमें ज्यादा कुछ कह सकना कठिन है ।

स्मारकके बारेमें आपने डॉ० अन्सारी, पण्डित मालवीयजी और सेठ घनश्यामदास बिड़लाके हस्ताक्षरोंसे युक्त अपील[] देखी होगी । मैं नहीं समझता कि इस कोषसे कांग्रेसका खर्च भरा जा सकता है। इसी तरह किसी महान व्यक्तिके नामपर प्रान्तीय कांग्रेसकी ओरसे अपील करना भी ठीक नहीं है । प्रत्येक संगठनको अपने गुणोंके आधारपर अपना अस्तित्व कायम रख सकना चाहिए और अपने ही गुणोंके वलपर अपने प्रति अपने प्रदेशके धनिक लोगों में विश्वास जगाना चाहिए । कुछ भी हो, यह मेरा निश्चित मत है । मैं नहीं जानता कि हस्ताक्षरकर्ताओंपर आपके सुझावकी क्या प्रतिक्रिया होगी। मेरे लिए तो यह एक अचरज ही है। मेरे विचारसे,

  1. १. देखिए “ अपील : लाजपतराय स्मारक कोपके लिए ", २६-११-१९२८ ।