सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१५३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

१३७. पत्र : बलवीर त्यागीको

सत्याहाश्रम, साबरमती[]
बुधवार [ २८ नवम्बर, १९२८ के पश्चात् ][]

चि० बलवीर,

तुमारे तो मुझको खत लोखना था । क्यों नहि लीखा है ? हफ्ते में एक समय तो लोखना ही चाहीये।

बापूके आशीर्वाद

जी० एन० ६६३५ की फोटो-नकलसे ।
 

१३८. किसे रोना चाहिए ?

मेरे सामने जबलपुरकी आम सभामें आचार्य कृपलानी द्वारा दिये गये भाषणकी टीपें पड़ी हुई हैं, जिनमें से मैं निम्नलिखित प्रभावपूर्ण अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ । इसे पढ़नेसे स्पष्ट हो जाता है कि लालाजीकी मृत्युसे वास्तवमें अंग्रेजोंको क्षति हुई है । यद्यपि अधिकांश अंग्रेज आज अंग्रेजोंके प्रति लालाजीकी सच्ची मित्रतासे अनभिज्ञ हैं तथापि एक दिन ऐसा आयेगा जब उन्हें मालूम हो जायेगा कि लालाजी जैसे देश-भक्तोंने उनकी क्या सेवा की है ।

लेकिन एक और भी पक्ष है, जिसे हमारी इस महान क्षतिमें हमारे साथ होकर शोक मनाना चाहिए, यद्यपि आज शायद उसे यह मालूम न हो कि उसने क्या खोया है । हमारे शासकोंको एक बहुत बड़े साम्राज्यको चिन्ता करनी है। और लालाजीके रूपमें उन्होंने एक सच्चा और ईमानदार मित्र खो दिया है। उस मित्रको विचारशून्य और मदान्ध सत्ताधारियोंने जब-जब दण्डित किया तब-तब उसने उनकी सहायता ही की ।
बंग-भंग आन्दोलनके दिनों में सरकारने लालाजीपर बिना मुकदमा चलाये उन्हें देश निकाला दे दिया था, फिर भी वापस आनेपर उन्होंने कांग्रेस राज-नीतिज्ञों में से तथाकथित गरमदलीय पक्षके कार्योंका विरोध किया। उन्होंने फोरोजशाह और गोखलेके नेतृत्व में चलनेवाले नरमदलको सहायता की । यद्यपि
  1. १. स्थायी पता ।
  2. २. पत्रके शीर्षनामेके कारण यह पत्र १९२८ का प्रतीत होता है। १९२८ में ही गांधीजीने ऐसे कागजका उपयोग किया है। देखिए “पत्र : अभय आश्रमको, ११-११-१९२८ । गांधीजीने यह पत्र वर्धा पहुँचने के पश्चात्, अर्थात् २४ नवम्बरके बाद पड़नेवाले बुधवारको ही लिखा होगा ।