जाये। "मैं जिन सिद्धान्तोंका निरूपण करता हूँ, उनमें तुम्हें श्रद्धा भले ही हो, किन्तु कुछ विशेष तथ्योंके आधारपर किये गये मेरे अनुमानोंपर तो श्रद्धा नहीं हो सकती। जो केवल तर्क-ग्राह्य है, उसमें श्रद्धाको स्थान नहीं है। इसलिए तथ्योंके विषयमें जहाँ मेरी मूल दिखाई दे और उसके कारण यदि मुझसे वहाँ त्रुटि होती हो, तो सुधार अवश्य सूचित करना।" (पृष्ठ २२९)
धर्मके नामपर होनेवाले अमानवीय कृत्योंकी ओर उनकी आत्मा किस प्रकार व्याकुल हो उठती थी, यह कलकत्ताके काली मन्दिरमें होनेवाले पशुओंके बलिदानके विषयमें लिखे गये एक पत्रसे प्रकट होता है। किन्तु वे मानते थे कि इस प्रकारकी क्रूर प्रथाएँ भी हृदय परिवर्तनसे ही समाप्त की जानी चाहिए। उन्होंने लिखा: "जब-तक मैं उनके हृदय नहीं जीत लेता, तबतक अपने अपूर्ण अस्तित्वके अभिशापको मुझे अपने कन्धोंपर सलीबकी तरह ढोना ही पड़ेगा।" (पृष्ठ २५९) इसके पहले कलकत्ता प्रवासके अवसरपर भी उन्होंने ऐसी वितृष्णा और विवशता व्यक्त की थी। ('आत्मकथा' भाग ३, अध्याय १८)
प्रार्थनाको गांधीजी जीवनमें और इसलिए आश्रम-जीवनमें भी बहुत बड़ा स्थान देते थे। आश्रमके निवासी जब कभी उस ओरसे उदासीनता व्यक्त करते, तो गांधीजी उन्हें समझाते: "शरीरको जिस प्रकार खुराककी जरूरत है और उसे उसकी भूख है, उसी प्रकार आत्माको प्रार्थनाकी जरूरत है और उसकी भूख है। प्रार्थना ईश्वरके साथ अपनेको जोड़नेका माध्यम है।" (पृष्ठ २०८) जब एक पत्र लेखकने प्रश्न किया कि कायरता और मनोविकारोंको जीतकर शाश्वत द्वन्द्वसे किस तरह उद्धार पाया जा सकता है तो गांधीजीने लिखा कि एक बार यदि हम यह निश्चय कर लें कि हमें दैवी शक्तियोंके पक्षमें अपनी शक्तिका उपयोग करना है, या आसुरी शक्तियोंके पक्षमें, तो फिर मनुष्य देखेगा कि प्रार्थना विकासका बड़ा ही शक्तिशाली साधन है। वह देखेगा कि मनुष्य अपने और ईश्वरके बीचमें पवित्र तादात्म्य स्थापित करके अपने-आपको आसुरी शक्तियोंकी जकड़से सर्वथा मुक्त कर ले सकता है। "हमें अपने अन्दर मौजूद विकारोंके दशाननको रामकी सहायतासे पराजित करना है।" (पृष्ठ २६८) गांधीजीने रामकी सहायता पानेका उपाय बताते हुए आश्रमवासियोंको लिखा: "यदि आप रोज सुबह आँख खुलते ही ईश्वरका स्मरण करें और दिनमें उपस्थित संघर्षो में उसकी सहायताके लिए प्रार्थना करें और सोनेसे पहले दिन-भरकी त्रुटियों और चूकोंका लेखा-जोखा कर लें और उसको ईश्वरके समक्ष स्वीकार करके सच्चे हृदयसे प्रायश्चित्त करें, तो इस प्रकार आप अपने चारों ओर जैसे रक्षाकी एक सुदृढ़ दीवार खड़ी कर लेंगे और फिर आपके लिए प्रलोभनोंका आकर्षण धीरे-धीरे घटता चला जायेगा। अपनी चूकके लिए प्रायश्चित्त करनेका सबसे सही तरीका यही है कि उसे दुबारा कभी न होने दिया जाये।" (पृष्ठ २७२)