१४८. पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको
सत्याग्रहाश्रम, वर्धा
२९ नवम्बर, १९२८
तुमने साबरमतीके पतेपर मुझे जो तार भेजा था, वह वहाँसे वर्धाके पतेपर मुझे भेज दिया गया और २६ तारीखको यहाँ मिल गया। पहले तो मुझे इसे समझने में दिक्कत हुई। मुझे लगा कि तुम्हें लालाजीकी मृत्युके बारेमें कुछ मालूम नहीं है। लेकिन जब मैंने देखा कि तुम्हें पहले ही इस आशयके चिन्ताजनक तार मिल चुके थे कि लालाजीको जो चोटें आई थीं, उनके कारण उनकी मृत्यु हो गई। मेरी अपनी राय यह है कि शारीरिक चोट उतनी गम्भीर नहीं थी, हालाँकि चोट हृदयके आसपास लगी थी और घातक भी हो सकती थी। और यदि मित्र लोग बीचमें न आ जाते तो चोटें निश्चय ही बहुत गम्भीर होतीं, लेकिन वे बड़ी बहादुरीके साथ उन्हें घेरकर खड़े हो गये और बहुत-से वार उन्होंने अपने ऊपर झेल लिये। लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि लालाजीको मानसिक आघात लगा था, जिससे वे कभी सँभल नहीं पाये। इस घटनाके बादके उनके सारे लेख, सारे भाषण मेरे इस कथनके स्पष्ट प्रमाण हैं। इस मामलेके प्रति सरकारने घोर उदासीनता दिखाई और एक लम्बा-चौड़ा वक्तव्य प्रकाशित करके लालाजीकी चुनौतीको बिना कोई विचार किये खारिज कर दिया, यहाँतक कि उसने लालाजीके नामकी भी चर्चा नहीं की। इस सबने उनके हृदय में सुलग रही आगमें घीका काम किया। उन्हें इस बातका इतना दुःख नहीं था कि उनके साथ अन्याय हुआ है जितना इस बातका कि सरकारने इस अन्यायके रूपमें समस्त राष्ट्रके साथ अन्याय किया है। जनताकी पस्तीने उस अपमानको और भी तीखा बना दिया। तुम देखोगे 'यंग इंडिया' में लालाजीके लिए राष्ट्रीय स्मारक बनानेके लिए एक अपील[१] जारी की गई है। सेठ घनश्यामदास बिड़लाने १५,०००, रुपयेकी विपुल राशि देकर उस कोषका शुभारम्भ किया है। मुझे उम्मीद है, लोग इस अपीलके उत्तरमें उदारतापूर्वक दान देंगे।
मैं कम से कम २० दिसम्बरतक वर्षामें हूँ। मुझे कुछ दिनोंके लिए कलकत्ता जाना होगा। वहाँ से मैं वापस साबरमती जाना चाहता हूँ। वहाँके जीवनमें खो जानेकी हिम्मत अभी मुझमें नहीं है। जाने क्यों मैं यह अनुभव करता हूँ कि मुझे कुछ समयके लिए बाहर अवश्य जाना चाहिए और फिर मेरी यूरोपकी यात्राकी बात भी तो है, जिसे मैंने कई बार स्थगित कर दिया है। यदि तुम्हारा विचार बदल गया हो और तुम यह समझते हो कि मुझे यूरोपकी यात्रापर नहीं जाना चाहिए तो मुझे तार देना। तुम्हारा निर्णय मेरे लिए अन्तिम होगा। यदि तुम 'हाँ' कहते हो तो तुम्हें तार देनेकी कोई जरूरत नहीं, क्योंकि यूरोप जानेकी मेरी इच्छाके बावजूद अनेक
- ↑ देखिए "अपील : लालाजी स्मारक कोषके लिए", २६-११-१९२८।