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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१६४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

ऐसी बातें हो सकती हैं जो मुझे न जाने दें। इसलिए मेरा जाना अपने समयसे ही हो सकेगा।

इसके साथ मैं मैकमिलन कम्पनीकी ओरसे भेजे गये पत्रकी एक प्रति भी भेज रहा हूँ। मुद्रणाधिकार प्राप्त करनेके बाद अब वे लोग उसका अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं। सोचता हूँ कि अगर मैं इसमें न पड़ा होता तो अच्छा था। इसमें मैं रेवरेंड होम्सके कारण पड़ा। खैर, जैसा है ठीक ही है। कदाचित् वे तुम्हें मंजूरी दे देंगे। यदि वे लोग आत्मकथाको खण्डों में प्रकाशित कर दें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। आत्मकथा लिखनेका सारा काम कब पूरा होगा, इसके बारेमें मैं कुछ कह नहीं सकता, हालाँकि मैं अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओंको छोड़ता जा रहा हूँ और जल्दी ही असहयोगके दिनोंतक पहुँच जानेकी कोशिश कर रहा हूँ। मैं कलकत्ताके विशेष अधिवेशनके बारेमें लिखने के बाद समाप्त कर देना चाहता हूँ, क्योंकि घटनाएँ अभी बहुत ताजा हैं और यदि आगे लिखूँ तो अनेक समकालीन नेताओंका वर्णन भी मुझे करना पड़ेगा। मैं यह भी महसूस करता हूँ कि इसे यहीं समाप्त कर देना युक्तिसंगत भी होगा, क्योंकि उसके बादसे मेरा जीवन बहुत ज्यादा सार्वजनिक हो गया है। इसलिए उसपर और लिखनेकी कोई जरूरत नहीं। और फिर 'यंग इंडिया' तो है ही; जो मुझे देखना चाहे वह इस दर्पण में देख सकता है।

महादेवको इस बार बारडोली जाँचके सिलसिले में बारडोली में ही छोड़ देना पड़ा। जाँच अच्छी तरह से चल रही है।

उम्मीद है, तुम अच्छी तरहसे होगे।

मुझे गोपबन्धुदासपर लिखा तुम्हारा लेख मिल गया है, हालाँकि देरसे मिला लालाजीके बारेमें तो अपने संस्मरण तुम भेजोगे ही।

कुमारी मेयोके बारेमें तुमने जो भूल-सुधार भेजी है, वह भी मुझे मिल गई है। उसे 'यंग इंडिया' के आगामी अंकमें प्रकाशित कर दिया जायेगा।[]

'ब्रिस्टल टाइम्स' की कतरन चौंका देनेवाली है, लेकिन आधुनिक पत्रकारिता ही ऐसी है और ऐसी ही है सत्यके बारेमें उन लोगोंकी कल्पना जो हवाई उड़ान करके दो-चार दिनोंके लिए कहीं जाते हैं और उतने ही समय में जो कुछ देखते हैं, उसीके आधारपर एक फतवा दे देते हैं।

श्री सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूज
११२, गोवर स्ट्रीट, लन्दन, डब्ल्यू॰ सी॰ १

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५०९९) की फोटो-नकलसे।

  1. यह भूल-सुधार ६ दिसम्बर, १९२८ का प्रकाशित हुई थी और इस प्रकार थी: "मुझे खेद है कि भारतके सम्बन्धमें कुमारी मेयोकी लिखी पुस्तक बारेमें लिखे मेरे लेख में अनजाने ही एक भूल चली गई। मुझे किसी अधिकारी व्यक्तिने बताया था कि कुमारी मेथोको युद्धके तुरन्त बाद प्रचार-कार्यके लिए एक पुस्तक लिखनेके लिए नियुक्त किया गया। मैंने उसकी बातपर बिना कोई छान-बीन किये विश्वास कर लिया। अब मैं देखता हूँ कि 'नियुक्त' शब्द जिससे यह प्रकट होता है कि पुस्तक लिखनेके एवजमें लेखिकाको कुछ पैसे दिये गये, सही नहीं था इसलिए मैं इस शब्दको क्षमा-याचनाके साथ वापस लेता हूँ।