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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१६५

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१४९. पत्र : नारणदास गांधीको

२९ नवम्बर, १९२८

चि॰ नारणदास,

तुम्हारा पत्र मिला ।

'नारणदासको जीतने'[] का जो अर्थ तुमने लगाया है यदि उसका वही अर्थ होता तो तुम्हारा दुःख मानना उचित होता। किन्तु तुम्हें ऐसा अर्थ लगाना नहीं चाहिए। इस वाक्यके आगे-पीछे हुई बातचीतका अनुमान तुम्हें किस प्रकार हो सकता है? यह वाक्य भाई छगनलालके साथ हुई बातके सन्दर्भ में था। तुम दोनोंके बीच दूरी है यह तो स्पष्ट है। छगनलाल मंत्री है। अपनी दुर्बलता वह जानता है और मैं भी जानता हूँ। 'नारणदासको जीतने' की बात लिखनेका अभिप्राय यह था कि तुम्हें समझना, तुम्हारी बात सुनना और मेलजोल करके तुम्हारे अनुकूल बनना उसका धर्म है। यह वाक्य मैंने इस अर्थ में कहा था। वह तुम्हारे दोषका सूचक नहीं है। यदि वह तुम्हारे दोषका सूचक होता तो मैं जीतनेकी बात न लिखता। और वाक्य इस प्रकार होता 'नारणदासको प्रेमपूर्वक सुधारना', इसके सिवा तुम्हारा दोष होता तो मैं पहले तुम्हें कहता। मैंने तुममें ऐसा कोई दोष नहीं देखा इसलिए तुमसे कुछ कहनेकी बात नहीं थी। तुम चुप रहो या जहाँ भूल देखो उसे न बताओ, यह तो मेरी इच्छा नहीं है। यदि न बताओ तो मैं इसमें तुम्हारा दोष मानूंगा। अब तो बात समझ गये? यदि कोई और बात स्पष्ट करानी हो तो लिखना। यह पत्र भाई छगनलालको दिखा सकते हो। मुझे यह भी लगता है कि दिखा देना ही ठीक है। लेकिन बताना, न बताना मैं तुम्हारी मर्जीपर छोड़ता हूँ।।

चलालाके[] विषय में थोड़ी पूछताछ कर लूँ तो पीछे लिखूँगा।

साथके पत्र दे देना।

बापूके आशीर्वाद

[ पुनश्च : ]
पुरुषोत्तम कैसा है? जीवनसे[] कुछ फायदा हुआ? जमना कैसी है?
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ७७२२) से।
सौजन्य : राधाबन चौधरी
  1. देखिए " पत्र: छगनलाल जोशीको ", २३-११-१९२८।
  2. सौराष्ट में रचनात्मक कार्यका एक केन्द्र।
  3. एक दवा।