यात्राके ही खर्चके लिए, क्योंकि वे चाहते थे कि मैं इन बातों में कभी कंजूसी न करूँ और न इनपर सार्वजनिक कोषका ही पैसा खर्च करूँ। मैंने यह बात आपको बता दी थी, लेकिन साथ ही आपके इस विचारसे सहमत हो गया कि अगर अपनी यात्राका खर्च मैं आपको भरने दूँ तो वह ज्यादा शोभनीय होगा। लेकिन, अब आप इस बातको जिस तरह से रख रहे हैं, उसे देखते हुए मेरा मन मुझपर खर्च हुई सारी रकम मय सूदके आपको वापस कर देने को होता है, बशर्ते कि आप उसे स्वीकार करने में अपमानका अनुभव न करें और उसका बुरा न मानें। मेरा खयाल है कि महादेवने उन खर्चीका हिसाब कहीं रख छोड़ा होगा।
एक और भी भारी भूल आपसे हुई है, जिसे मैं सुधार देना चाहूँगा। तिलक स्वराज्य कोषका तो लेखा परीक्षक द्वारा जाँचा गया पूरा हिसाब-किताब मौजूद है। छपे हुए हिसाब में प्राप्त हुए एक-एक पैसेका ब्योरा दर्ज है। यह सारा हिसाब वर्षोंसे जनताके सामने है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा और शायद दुःख भी कि २० लाखकी बात तो जाने दीजिए, तिलक स्वराज्य कोषके लिए मुसलमानोंसे दो लाख भी नहीं मिले थे। मैं इसकी कोई शिकायत नहीं करता, लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप सत्यको एक पवित्र चीज मानकर चलें। और अगर आप मुझसे खिलाफत कोषमें हिन्दुओं द्वारा दी गई मोटी-मोटी रकमोंकी जानकारी लेना चाहें तो मैं आपको वह जानकारी देनेके लिए तैयार हूँ और जो-कुछ बताऊँगा वह शायद आपके लिए दूसरा आश्चर्य होगा। याद कीजिए उन उत्साहपूर्ण दिनोंकी जब हम दोनों साथ-साथ दुकान-दुकान जाकर चन्दे माँगा करते थे। क्या आपको याद है कि तब हिन्दू लोग तिलक स्वराज्य कोषकी ही तरह खिलाफत कोषके लिए भी चन्दा देनेके लिए एक-दूसरेसे किस तरह होड़ किया करते थे? क्या मैं आपको नमूनेके तौरपर एक सूची भेजूँ? अगर मैं गलती कर रहा हूँ तो आप उसे सुधार दें, लेकिन विरोधी दावा करके नहीं, बल्कि आँकड़े देकर। लेकिन अगर आपके पास आँकड़े न हों तो मैं चाहता हूँ कि आप जल्दबाजी में यह खेदजनक भूल कर बैठनेके लिए क्षमा माँगिए--मुझसे नहीं, जनतासे नहीं, बल्कि ईश्वरसे।
कावसजी जहाँगीर हालकी सभाके बारेमें आपने जो-कुछ कहा, उसकी रिपोर्ट पढ़वाकर मैंने सुनी। श्रोताओंका व्यवहार इतना अभद्र था जिसका शब्दोंमें वर्णन नहीं किया जा सकता। पश्चिमी दुनियाकी इस नकलको मैंने सदा एक अधम और हमें अधम बनानेवाली चीज माना है। यह घिनौनी नकल अभी शायद हमारा बहुत कुछ अनिष्ट करनेवाली है। आपकी बात आदरपूर्वक सुनना श्रोताओंका कर्त्तव्य था। विशेषकर शोकसभा में तो ऐसा आचरण करना अपराधपूर्ण काम था। जिस चीजको मैं आपका कुछ समय के लिए गुमराह हो जाना मानता हूँ, उसके बावजूद सभाको मातृ-भूमिकी आपके द्वारा की गई अनेक शानदार सेवाओंको याद करना चाहिए था। लेकिन, इस सवालपर हम दोनोंमें जो मतैक्य है, वह यहीं समाप्त हो जाता है। आपने समस्त हिन्दू समाजको हर तरह से निन्दनीय ठहरानेके लिए जो निष्कर्ष निकाला है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ। जिस श्रोता समुदाय में सिर्फ मुसलमान ही रहे हों, उस