१६२, एक बढ़िया शुरुआत
[१-१२-१९२८][१]
लालाजी स्मारकके लिए चन्दा जमा करने के कामकी शुरुआत बढ़िया ढंगसे हुई है। श्रीयुत घनश्यामदास बिड़लाका नाम वर्धाकी सूची में सबसे ऊपर है। उन्होंने १५,००० रुपये दिये हैं। पंजाब में एक प्रभावशाली प्रान्तीय समितिका बनना और यह लेख लिखनेके समय (पहली तारीख) तक २५,००० रुपयेके चन्दोंकी सूची बन जाना भी बतलाता है कि इसका भविष्य उज्ज्वल है। मेरी यही कामना है कि सभी प्रान्त इसका अनुकरण करेंगे और चन्देकी अपनी न्यूनतम सीमा निर्धारित करके उसे जमा करनेपर जुट जायेंगे। मैंने भी एक तरीका सुझाया था कि जनसंख्याके आधारपर अपना-अपना अंश निर्धारित कर लिया जाये, लेकिन इस तरीकेको स्पष्ट ही उन प्रान्तों, जिलों या नगरोंपर लागू नहीं किया जाना चाहिए जो कहीं अधिक अंशदान कर सकते हैं। उदाहरणके तौरपर, यदि बम्बई अपनी जनसंख्याके आधारपर अपना निश्चित अंश कोषाध्यक्षको सौंपकर छुट्टी कर ले, तो वह हास्यास्पद ही लगेगा। उसका हिस्सा तो बम्बईकी विश्वव्यापी ख्यातिके अनुरूप ही निर्धारित किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देशमें भारी असमानताएँ मौजूद हैं--कोई क्षेत्र अत्यधिक समृद्ध है तो कोई अत्यधिक निर्धन। देशकी जनसंख्याका दसवाँ नहीं बल्कि पाँचवाँ भाग ऐसा है जो भुखमरीकी हालत में रहता है और इसलिए वह बिलकुल भी चन्दा नहीं दे सकता। उनका भार नगरों और अन्य समृद्ध क्षेत्रोंको ही वहन करना पड़ेगा।
हम अब पंजाब केसरीकी दहाड़ नहीं सुन पायेंगे। लेकिन इस स्मारकके कोषमें लोग जितनी तेजीसे चन्दा जमा करेंगे, उसीसे पता चलेगा कि जनताको पंजाब केसरी की स्मृतिको स्थायी बनाये रखने के कामपर कितनी निष्ठा है। पर इतना याद रखिए कि प्रतिष्ठित हस्ताक्षरकर्त्ताओंने जितनी राशिके लिए अपील की है उसकी दोगुनी राशिसे भी हमारी आजकी आवश्यकताओंकी पूर्ति नहीं हो पायेगी। दिन-दिन इस बातका अधिकाधिक प्रमाण मिलता जा रहा है कि लालाजीपर क्रूरतापूर्ण आक्रमण करके जिस राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की पीठ में छुरा भौंका गया था उसे फिर बहाल करनेके लिए हमें स्वराज्यका दिन निकट लाने का कोई उपाय खोजना पड़ेगा। ऐसा एक उपाय--और सबसे नरम उपाय--यही है कि लालाजी द्वारा शुरू किये गये कामको पूरा किया जाये। उन्होंने नेहरू प्रतिवेदनके प्रचारका काम शुरू किया था। इस दिशा में प्रयत्न करना निश्चय ही वांछनीय है और बिलकुल व्यावहारिक भी है। प्रतिवेदनके लिए जनताका सर्वसम्मत अनुमोदन प्राप्त करना राष्ट्रकी प्रगति में योग देना ही होगा। अपने आपमें तो उससे 'डोमीनियन स्टेटस' औपनिवेशिक स्वराज्य भी हमें नहीं मिल
- ↑ गांधीजीने स्वयं ही इसके १-१२-१९२८ को लिखे जानेका उल्लेख किया है ।