सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/१८२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१४८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

अतिशयतासे इस कार्यमें गम्भीर भूल की है और अपने पवित्र हाथको अपवित्र किया है। मुझे विश्वास है कि अगर आप फिरसे विचार करेंगे तो इस बातकी सच्चाई आपके ध्यानमें आ जायेगी और वह भूल दीपकके समान स्पष्ट दिखलाई पड़ेगी। निस्सन्देह आपके समान सत्यका साक्षात् अनुभव करनेवाले महात्माको विशेष लिखना अनुचित है। मगर तो भी एक विनती करनेकी इच्छा होती है। अगर ऊपर लिखा हुआ काम आपको अपनी भूल जान पड़े और आप उसे अपने स्वभाव के अनुसार प्रदर्शित करें तो संसार जरूर आपका आभारी होगा, और विशेष अनर्थ होनेसे रुकेगा। निःसंशय आपके कृत्यसे अनर्थ होने का भय और उसका पाप आपके सिर रहेगा। इसलिए आप जितनी जल्दी भूल कबूल करेंगे, उसमें आपका और जगतका लाभ है, कल्याण है। अस्तु, प्रभु सबको सन्मति दे।

इस लेखक और ऐसे ही दूसरोंसे मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि मेरी स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं उनके कहने से भूल मान लूँ। मैं इतनी प्रतिज्ञा अवश्य कर सकता हूँ कि इस विषय में मुझे अपनी भूल जिस क्षण मालूम होगी, उसी क्षण मैं उसे नम्रतापूर्वक कबूल कर लूंगा और की हुई भूलका प्रायश्चित्त भी करूँगा। मैं यह भी कबूल करता हूँ कि मैंने जो किया है वह अगर भूल ही है तो वह छोटी नहीं गिनी जायेगी क्योंकि वह धर्मके नामपर भले ही अज्ञानमें, अधर्मका आचरण करना सिद्ध होगा। ऐसा करना किसीके लिए शोभनीय नहीं हो सकता। मेरे आचरण का अनुकरण बहुत लोग करते हैं, इसलिए मेरे लिए तो वह कभी शोभनीय हो ही नहीं सकता। मुझे अपनी इस जिम्मेदारीका पूरा भान है।

साथ ही मेरा यह भी विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति निर्दोष बुद्धिसे भूल कर बैठे तो उसके लिए दूसरेको या संसारको कष्ट नहीं भोगना पड़ता। निर्दोष व्यक्तियोंकी भूलके दुष्परिणामोंसे ईश्वर जगत्को बचा लेता है। जिन्हें मेरे भूलभरे आचरण जैसा आचरण करना होगा वे तो मेरे वैसा किये बिना भी यही करते। आखिर तो मनुष्य अपने मनके अनुसार ही चलता है। दूसरेका आचरण तो निमित्तमात्र होता है। बात ऐसी हो या न हो, मगर इतना मैं जानता हूँ कि मेरी भूलोंके कारण आजतक संसारको पश्चात्ताप नहीं करना पड़ा है। क्योंकि मेरी भूलोंके मूलमें केवल मेरा अज्ञान ही था। मुझे ऐसा दृढ़ विश्वास है कि मैं जानबूझकर भूलें नहीं करता और इसलिए मुझे उनसे अनिष्ट होने की आशंका नहीं है। अगर यह मेरी भूल ही रही हो, तो दैव ही जाने मैं उसे कब देख सकूँगा। तुलसीदासने गाया है:

रजत सीप मँह भास जिमि, यथा भानुकर वारि।
जदपि असत तिहुं काल सोइ, भ्रम न सके कोउ टारि॥

मेरी ऐसी दशा है और ऐसी दशा सभी सत्य शोधकोंकी नित्य रहती है; और रहनी चाहिए।