में से पैदा नहीं हो सकती। हिंसा और अहिंसा दोनोंमें बहादुरीकी आवश्यकता तो है ही। अहिंसा वीरताकी पराकाष्ठा है।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, २-१२-१९२८
१६७. विरोधको कैसे जीतें?
कोई व्यक्ति यदि सार्वजनिक कामोंमें जिम्मेवारीके पदपर हो और उसकी द्वेष-भावसे अथवा किसी दूसरे कारणसे झूठी टीका होती हो, यह कहा जाता हो कि वह सार्वजनिक धनको हड़प जाता है, तो उसे क्या करना चाहिए। क्या वह झूठे इलजाम लगानेवालोंपर अदालत में दावा करे? अपनी सार्वजनिक जिम्मेदारियों का खयाल करके दावा करना क्या उसका धर्म नहीं है? यदि वह नालिश न करे तो क्या कुछ लोग ऐसे झूठे इलजामोंको सच नहीं समझ बैठेंगे? और यदि यह कहें कि नालिश किसी हालत में नहीं की जानी चाहिए तो क्या यह भय नहीं है कि लोग इससे नाजायज फायदा उठायेंगे; ऐसे शख्स दरअसल आपको सलाहका दुरुपयोग करके जबरदस्त बनकर बेफिकीसे मौज उड़ायेंगे और रुपया हड़प करते चले जायेंगे? और यदि यही तय किया जाये कि अदालत में कदापि नहीं जाना चाहिए तो फिर ऐसे आरोपोंके विरोधका कुछ-न-कुछ इलाज तो होना ही चाहिए।
इसका साधारण उत्तर तो सरल है। महान पुरुषोंकी निन्दा करनेवाले हमेशा ही पाये जाते हैं और विरोधका जवाब अविरोध है, यह न्याय यहाँ लागू होता है। अदालत में नालिश करनेसे, और उसमें सफल हो जानेसे, सच पूछिए तो निर्दोषता सिद्ध नहीं होती। ऐसे चालाक और बदमाश लोग भी दुनिया में मौजूद हैं जो अदालतोंसे भी प्रमाणपत्र प्राप्त करके अपनी बुराईको पालते-पोसते और आगे पनपाते चले जाते हैं। फिर पापीका मुँह सजा पा जानेसे बन्द नहीं हो जाता। जो बात पहले वह खुले आम कहता था, अदालतसे सजा होने के बाद वही बात चुपके-चुपके कह सकता है। इसलिए साधारण तौर पर तो मेरी सलाह यह है कि झूठे इलजामों की बिल्कुल चिन्ता नहीं करनी चाहिए। जो लोग ऐसे आरोप लगाते हैं उनपर दया दिखानी चाहिये और ईश्वरसे ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए कि कभी न कभी वे अपनी भूल समझें। फिर भी राष्ट्रके पास झूठे सेवकोंसे बचनेके बहुत-से साधन हैं, सेवकोंपर जो आरोप किये जाते हैं, जनतातक वे पहुँच तो जाते ही हैं। जनताको हिसाब-किताब देखनेका पूरा अधिकार है, इसलिए उसका धर्म है कि वह सेवकका हिसाब-किताब देखे जाँचे। यदि जाँच करनेपर सन्देह हो तो सेवकको अलग किया जा सकता है। उसपर अदालत में मामला भी चलाया जा सकता है। पंचके द्वारा जाँच कराई जा सकती है। सारांश यह कि निन्दकपर दावा करनेकी