१६८. पत्र : छगनलाल जोशीको
आश्रम, वर्धा
२ दिसम्बर, १९२८
तुम्हारा पत्र मिला।
मजदूरोंके बारेमें तुमने जो लिखा है वह सही है। और जो हिसाब किया है वह ठीक है। जो अपना यज्ञ-कार्य करने के बाद दूसरे काम मुल्तवी कर सकें, वही मजदूरी करें। वे उस दिन अध्ययन न करें और उतना समय मजदूरी में लगायें। पर उन्हें जो काम दिया जाये, उसकी सचमुच आवश्यकता होनी चाहिए; नहीं तो ऐसा माना जायेगा कि आश्रमके पैसेमें से दान किया गया।
बरसात तो यहाँ भी हो गई है। कहते हैं कि यहाँ ऐसा ही होता है। डाक चली गई, पर तार न भेजकर बारह आने बचा लिये सो ठीक ही किया।
मेरे पत्रके दो पृष्ठ मिले; सो ठीक ही था। उनमें कहीं सम्बन्ध छूटा हुआ तो नहीं लगा होगा। मैंने तीनका अंक तीसरे पृष्ठके लिए दिया था। पीछेके पृष्ठ पर मैं अंक लिखता नहीं हूँ किन्तु उसे गिनता जरूर हूँ।
मैं जानता हूँ कि मुझे कपड़ेवाले लिफाफेकी कीमत देनी पड़ती है। मैं सुब्बैया, प्यारेलाल या महादेवसे ऐसा नहीं करा सका तो भी इस लिफाफेका उपयोग इस प्रकार है: उसे चाकूसे खोलना चाहिए और बंद करने के समय हर बार नया मोटा कागज लेकर बंद करना चाहिए। जिधर पता लिखा जाता है वहाँ हर बार नया कागज चिपका दें। ऐसा करने पर कपड़ेके एक ही लिफाफेसे काफी समय तक काम लिया जा सकता है। सादे लिफाफोंका खर्च बचानेके लिए भी सरकारी जेलोंमें ऐसी कई युक्तियोंसे काम लिया जाता है। यह तो तुम्हें मालूम ही होगा?
भाई शंकरलालके प्रश्नसे तुम्हें कुछ परेशानी न हो तो मुझे तो नहीं ही है। यदि नारणदास संस्थाके और तुम्हारे अधीन रहकर काम करे तो इससे हमारा काम और संघका काम सँभल जायेगा। भाई शंकरलाल मुझे पूछेंगे तो मैं बात कर लूँगा। मेरे लिए मुख्य प्रश्न उन्हें सन्तुष्ट करनेका नहीं बल्कि तुम्हें सन्तुष्ट करनेका है। तुम्हारा काम अच्छी तरह चलना चाहिए, इसके लिए तुम्हें जो सुविधा आवश्यक लगे माँग लेना।
शंकरभाई स्वस्थ हो गये हैं यह तो खुशीकी बात है। उनसे कहना फिर बीमार न पड़ें।
क्या गंगादेवीको सिलाईका कुछ काम दिया है? न दिया हो तो अब दे देना।
आजकी डाक दोपहरको मिली। नारणदास परेशान है। उसका पत्र भेज रहा हूँ। तुम सबको ठीक लगे तो जैसा नारणदासका कहना है, वे सब आश्रममें रह