१७६. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको
वर्धा
३ दिसम्बर, १९२८
मेरा स्नेह लो। सब कुछ बड़ी बहादुरीके साथ किया। अभी तो तुमको कहीं ज्यादा बहादुरीके करतब करने हैं। ईश्वर तुमको लम्बी उम्र दे और भारतको परतन्त्रतासे[१] मुक्ति दिलानेका मुख्य साधन तुमको ही बनाये।
तुम्हारा,
बापू
- [अंग्रेजीसे]
- ए बंच ऑफ ओल्ड लैटर्स
१७७. पत्र : आश्रमकी बहनोंको
वर्धा
मौनवार, ३ दिसम्बर, १९२८
गंगाबहनका लिखा हुआ आप लोगोंका पत्र मुझे मिल गया है। शोर-गुलके बारेमें तुमने जो लिखा है, उससे इस दोषका कुछ बचाव होता है सही। परन्तु इसमें सिर्फ बच्चोंकी ही जिम्मेदारी नहीं, बड़ोंकी भी है। इसके अलावा खाते समय या काम करते समय शान्ति रखना या बच्चोंसे रखवाना बड़ी बात न होनी चाहिए। खास बात यह है: तुम बहनें यह न मान बैठो कि बातोंके बिना खानेका या काम करनेका समय कटेगा ही नहीं, या बच्चोंको शान्त रखा ही नहीं जा सकता। शान्ति से काम करनेवाले करोड़ों मनुष्य हैं। तुम जानती हो न कि बड़े कारखानोंमें मजदूरोंको जबरदस्ती शान्ति रखनी पड़ती है। जो वे जबरदस्तीसे करते हैं, वह हम स्वेच्छासे क्यों न करें?
अब तुम्हारे पास हफ्ते में एक बार काका साहब आया करेंगे। क्या फिर भी वालजीभाईसे आग्रह करने की जरूरत मालूम होती है? मैं आग्रह करूँगा तो वे
- ↑ जवाहरलालने अपनी पुस्तिका में इसका खुलासा इन शब्दों में किया था: "मेरा खयाल है कि यह खत लखनऊकी घटनाके तुरन्त बाद ही लिखा गया था। वहाँ हममें से कई लोगोंने साइमन अयोगके आनेके विरोध में एक शान्तिपूर्ण ढंगसे प्रदर्शन किया था। हमें पुलिसने डण्डों और लाठियोंसे बुरी तरह पीटा था। "