१८२. पत्र : अच्युतानन्द पुरोहितको
वर्धा
४ दिसम्बर, १९२८
आपका पत्र मिला और तार भी। मैंने आपको कोई भी उत्तर इसलिए नहीं दिया कि मैं तिथि निर्धारित नहीं कर सका हूँ। २० और २३ के बीचकी कोई तिथि रखी जायेगी।
मेरे साथ मेरी पत्नीके अलावा तीन-चार अन्य सज्जन भी होंगे, पर उनके लिए कोई खास प्रबन्ध करनेकी परेशानी मत उठाइए। वे वहीं ठहरेंगे जहाँ आप मुझे ठहरायेंगे। मेरे लिए भी कोई खास इन्तजामकी जरूरत नहीं। मैं चाहता हूँ कि आप जितना भी चन्दा इकट्ठा करें उसकी पाई-पाई बचानेकी कोशिश करें। मेरे लिए कोई फल मँगानेकी जरूरत नहीं। साधारण भोजन ही पर्याप्त है। इन्तजाम अगर कोई करना है तो बस सेर-भर बकरीके दूधका ही करना है। मुझे बस एक चीज जरूर चाहिए--किसी साफ जगह में कमोड रखा जाये। कृपया कलकत्तासे कोई फल न मँगायें।
हृदयसे आपका,
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३००९) की फोटो-नकलसे।
१८३. पत्र : पद्मजा नायडूको[१]
सत्याग्रहाश्रम, वर्धा
४ दिसम्बर, १९२८
यह पत्र बोलकर लिखवाया गया है, इसका बुरा मत मानना। तुमको पत्र लिखने में देर करनेसे कहीं अच्छा है कि मैं बोलकर लिखवा दूँ। आखिर तुम अपने स्वास्थ्यके बारेमें क्या कर रही हो? इसके लिए क्या अधिक दोषी तुम्हारा दिमाग ही नहीं है? तुम स्वस्थ बनने और बनी रहनेका संकल्प क्यों नहीं कर पाती? तुम्हारे स्वास्थ्य में इस बार जो गिरावट आई है उससे अमेरिकामें उस बेचारी बूढ़ी कोकिलाको[२] परेशानी तो हो ही जायेगी। तुमको एक अच्छी पुत्री बनना चाहिए।
- श्रीमती पद्मजा नायडू
- हैदराबाद
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३०१३) की फोटो-नकलसे।