१८८. पत्र : जगदीशचन्द्र बसुको
वर्धा
५ दिसम्बर, १९२८
मैं तो कूप-मण्डूक हूँ, जिसे पता नहीं कि कूपसे बाहरकी दुनियामें क्या हो रहा है। आपके जन्म-दिवसकी बात मुझे कल ही पता चली। देरसे ही सही, मेरी बधाई भी आप अन्य बधाइयोंके साथ स्वीकार करें--यही मेरा अनुरोध है। ईश्वर आपको दीर्घायु बनाये जिससे भारत आपकी दिन-दिन बढ़ती शक्ति और महानतासे लाभान्वित होता रहे।
हृदयसे आपका,
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८७३६) की फोटो-नकलसे।
१८९. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको
आश्रम, वर्धा
५ दिसम्बर, १९२८
तुम्हारा पत्र मिला। शहदकी बात समझी। अपनी आर्थिक, शारीरिक और बौद्धिक गरीबीका ठीक-ठीक दर्शन कर रहा हूँ।
खादी-प्रचारके विषय में तुमने ज्यादा विचार किया है। इस प्रयत्नमें यदि तुम्हें आर्थिक सहायता मिली तो तुम ज्यादा काम कर सकोगे--ज्यादा यानी सारे देशकी खादीका। अपना स्वास्थ्य अच्छा बनाना। माथेरान जाकर और स्वास्थ्य सुधारकर आना। बम्बई में रहकर पिसते रहने से ज्यादा अच्छा है। वेलाबनके वियोगका दुःख ज्यादा तो नहीं करते हो? नरसी मेहताकी यह उक्ति याद करना: "अच्छा हुआ जंजालसे छूट गया। अब श्री गोपालका मिलना ज्यादा सरल होगा।"
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (एस॰ एन॰ ९७६५) की फोटो-नकलसे।