प्रभावती अब चली गई होगी, इसलिए पत्र नहीं लिख रहा हूँ। विद्यावती[१] वहाँ होती तो पत्र लिखता। हो तो कहना--उसे बीमार हरगिज न पड़ना चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी॰ एन॰ १७६३२) की फोटो-नकलसे।
१९२. पत्र : छगनलाल जोशीको
बुधवार [५ दिसम्बर, १९२८][२]
तुम्हारा पत्र मिला। मेरी सलाह है कि मैं जो भी पत्र तुम्हें लिखता हूँ, सब नारणदासको दिखाते जाओ। इससे तुम्हारा रास्ता सुगम होगा और उसे भी मदद मिलेगी। नारणदासको तटस्थ न रहने के लिए लिखा तो है।
सन्तोकबहन राजकोट जाये तो जाने दो। तुम बेशक उसके पास जाओ और उसे समझाओ। आश्रमका वातावरण उसे अच्छा लगे और वह वहाँ रहे तो मुझे बड़ी खुशी होगी। लेकिन मुझे रोज-रोज उसकी मान-मनोती करनी पड़े और तब वह रहे, यह मैं नहीं चाहता।
देश-सेवा के कार्य में सगे-सम्बन्धी साथ दें, यह स्वाभाविक है और इष्ट है। मुश्किल तो तभी आती है जब स्वार्थं साधनेकी बात उठती है। मनमें इस बातकी पूरी प्रतीति हो जाने के बाद कि हममें कोई निजी स्वार्थ नहीं है, हम सभी सगे-सम्बन्धियोंको आमन्त्रित कर सकते हैं; उनका आना तो अपने-आपको यज्ञमें होमनेके लिए आना समझा जायेगा।
रामके साथ उनके सगे ही लोग थे। युधिष्ठिरके साथ भी ऐसा ही था। यही बात पैगम्बर मुहम्मदके साथ भी थी। ईसाके साथियोंमें उनका भाई था। लॉर्ड सेलिसबरी अपने आस-पास अपने सग-सम्बन्धियोंको रखते थे। इसपर किसीने उनकी आलोचना की तो उन्होंने कहा: "इस बलिदानमें अगर मैं अपने सगोंको न होमूँ तो किसको होमूँ? इनपर विश्वास न करूँ तो किसपर करूँ? अगर मेरे दूसरे सगे भी ऐसे योग्य निकलें तो मैं उन्हें भी होमना चाहूँगा। मेरे लिए यह पैसा कमानेका नहीं, बलिदानका स्थान है।"
बाल्फर लॉर्ड सेलिसबरीके सगे थे। इससे उलटे अर्थात् सगोंको विभिन्न पदोंपर स्वार्थ सिद्धिके लिए नियुक्त किये जानेके दृष्टान्त भी असंख्य हैं। इसका सार यह हुआ कि जहाँ स्वार्थ नहीं है वहाँ सगे और पराये समान हैं और जहाँ स्वार्थ है,