वहाँ पराया होनेसे ही क्या अन्तर पड़ सकता है? फिर भी, जैसा कि तुमने लिखा है सबको सँभल-सँभलकर चलना चाहिए। मेरा विश्वास है कि मुझे तो अपने प्रयोगमें कुछ गँवाना नहीं पड़ा है। ऐसा ही हम-जैसे सभी लोगोंके बारेमें समझना। हमारे देशमें बरावरीके लोग सहज ही एक साथ हो कर काम नहीं कर सकते, क्योंकि अभी हमारे लोगोंमें त्याग-भावनाका पर्याप्त विकास नहीं हुआ है।
गोशालाके विषयमें तुम्हारा प्रश्न मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाया हूँ। तुम विस्तारसे लिखोगे, तभी समझ सकूँगा।
लाहोरी राम जबतक खाट न पकड़ ले और अपनी राह चलता जाये तबतक तो हमें उसको अपने बीच रहने ही देना चाहिए। वह अपनी जीभ पर अंकुश न रखे तो बात और है। अगर हमें निश्चय हो कि जो हमारे पास आया है, वह अच्छा आदमी है तो हमें उसे अपनी ओरसे ढकेल कर निकालने की बात नहीं सोचनी चाहिए। यदि शुरूमें ही उसे न रखा होता तो बात दूसरी होती।
लुटेरोंके आनेपर हम अपने आपको बलिदान कर देनेके लिए तैयार रहें तो इतना हमारे लिए काफी है। अच्छा तो यह हो कि हममें से कोई उन लुटेरोंके बीच जाकर [उन्हें सही रास्ता दिखानेके लिए] काम करना शुरू कर दे।
बापूके आशीर्वाद
दोबारा नहीं पढ़ा। कल वाला लिफाफा चिथड़ा हो गया था । उसे धागेसे बाँध देना चाहिए था।
बापू
- [गुजरातीसे]
- बापुना पत्रो : श्री छगनलाल जोशीने
१९३. टिप्पणी
'उसकी और हमारी दृष्टि एक जैसी है'
श्री एन॰ एम॰ बैल एक छोटी-सी पत्रिका 'इंटरनेशनल सनबीम' के सह सम्पादक हैं। २ शिलिंग वार्षिक मूल्यकी यह पत्रिका ५९, मेरीज रोड, क्राइस्ट चर्चसे प्रकाशित होती है। श्री बैलने अपनी मासिक पत्रिकाकी एक प्रति मुझे भेजनेकी कृपा की है। उसका एक दिलचस्प लेख मैं नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ।[१]
हम जिन वातायनोंसे जीवनको देखते हैं, भारत उनसे भिन्न वातायनोंसे देखता है; लेकिन उसकी दृष्टि हमारी दृष्टि जैसी ही है और उसकी इच्छाएँ भी वही हैं जो हमारी हैं।
- ↑ यहाँ केवल कुछ अंश ही दिये जा रहे हैं।