१९४. उसका रक्त-रंजित इतिहास[१]
ऐसा लगता है कि पंजाब सरकारने अपने यहाँकी पुलिसको प्रमाणपत्र दे कर लखनऊ पुलिसके हौसले बढ़ा दिये हैं और वह खुलकर लाठी-भालोंके इस्तेमाल में पंजाब पुलिससे भी आगे बढ़नेपर तुल गई है। पण्डित जवाहरलाल नेहरूके कथनानुसार, लखनऊ पुलिस तो एक बिलकुल ही निर्दोष भीड़को तितर-बितर करनेके लिए ईट-पत्थरोंके इस्तेमालसे भी नहीं चूकी। हम मान लेते हैं कि प्रदर्शनकारी सर्वथा वैध समझे जानेवाले आदेशोंका उल्लंघन कर रहे थे, फिर भी मैं कहूँगा कि प्रदर्शन-कारियोंपर हमला करनेका पुलिसके पास तबतक कोई औचित्य नहीं हो सकता जब तक प्रदर्शनकारियोंकी ओरसे सरकारी सम्पत्ति या पुलिसके लोगोंको कोई नुकसान पहुँचनेका खतरा बिलकुल सामने न दिखने लगे। मैं पण्डित जवाहरलाल द्वारा जुटाये गये विवरणको ही आधार मानकर चल रहा हूँ। उसके अनुसार, भीड़ सर्वथा नियन्त्रित और शिष्टतापूर्ण थी। किसीको भी हानि पहुँचानेका उसका कोई मंशा नहीं था। जाहिर था कि उसका मंशा बस इतना ही था कि लखनऊ में एक ऐसे आयोगके विरोधमें शान्तिपूर्ण ढंगसे प्रदर्शन करे जिसे जनतापर उसकी इच्छाके विरुद्ध थोपा जा रहा है। ऐसी परिस्थितिमें पुलिस द्वारा दमनकारी शक्तियोंका प्रयोग निरंकुशतापूर्ण, अनावश्यक और क्रूरतापूर्ण था। लेकिन इतनी बड़ी उत्तेजनाके बावजूद और उनके मनोनीत नेता पण्डित जवाहरलाल नेहरू तथा उनके साथियोंपर हुए कायरतापूर्ण आक्रमणके बाद भी, प्रदर्शनकारियोंने जो बर्ताव किया वह आश्चर्यजनक और अनुकरणीय था। जनताने भी उतने ही अधिक आत्मसंयमसे काम लिया जितना कि उसके नेताओंने। मेरा दावा है कि लखनऊ के प्रदर्शनकारियोंने जितने शान्त चित्त रह कर वह सब सहा है, भारतके अलावा अन्य किसी भी देशकी जनता वैसी परिस्थितिमें उतनी शान्त चित्त नहीं रह पाती।
लेकिन लगता है कि सशस्त्र पुलिसकी रक्षा में चलनेवाले शूरवीर कमिश्नर इस शान्तिप्रियताको शायद कायरता समझ बैठे हैं। वे रक्तपातके बलपर ही आगे बढ़नेपर तुले मालूम पड़ते हैं। पंजाबमें निर्दोष जनताका रक्त बहाया गया था और लखनऊ पुलिसने भी उतनी ही निर्दोष जनताको उससे कहीं अधिक गम्भीर चोटें पहुँचाई हैं। दो व्यक्ति तो इतनी बुरी तरह जख्मी हो गये हैं कि उनकी जान पर ही आ बनी है। वैसे तो अंग्रेज कमिश्नरोंके आचरणका औचित्य समझना ही काफी कठिन है, लेकिन उनके अधीनस्थ भारतीय अफसरोंके आचरणका औचित्य सिद्ध करना तो और भी कठिन काम है। लगता है कि वे यह महसूस नहीं करते कि उनके और जनता के बीच की खाई दिन-दिन कितनी चौड़ी होती जा रही है, वे उस जनतासे कितने दूर पड़ते जा रहे हैं जिसके वे प्रतिनिधि माने जाते हैं और
- ↑ देखिए "रक्त-रँजित पथ", ९-१२-१९२८ भी।